व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि: संविधान, नागरिक अधिकार और लोकतंत्र की कसौटी व्यक्तिगत स्वतंत्रता किसी भी लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला है। किसी राष्ट्र की वास्तविक लोकतांत्रिक सफलता केवल चुनावों, सरकारों और संस्थाओं से निर्धारित नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि उसके नागरिक कितनी स्वतंत्रता, गरिमा और सुरक्षा के साथ अपना जीवन जी सकते हैं। “व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है” एक ऐसा विचार है, जो व्यक्ति के अधिकारों और राज्य की शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देता है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ केवल गिरफ्तारी या हिरासत से मुक्त रहना नहीं है। इसमें स्वतंत्र रूप से विचार करना, अपनी बात रखना, निजी जीवन की रक्षा करना और अपने जीवन से जुड़े निर्णय लेना भी शामिल है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी पहचान, विचार और जीवन जीने का तरीका होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का दायित्व है कि वह इन अधिकारों का सम्मान करे और किसी व्यक्ति को बिना उचित कानूनी आधार के मनमाने हस्तक्षेप का सामना न करना पड़े। भारतीय संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण संवैधानिक संरक्षण प्रद...
भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता; प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा। भारत के राज्यक्षेत्र में राज्य, संघ राज्य क्षेत्र तथा भारत द्वारा अर्जित अन्य क्षेत्र शामिल हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 2 संसद कानून बनाकर नए राज्यों को भारत संघ में प्रवेश दे सकती है या नए राज्यों की स्थापना कर सकती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद नए राज्यों का गठन कर सकती है तथा किसी राज्य का क्षे...