जीवन का वास्तविक मूल्य किसी परीक्षा के अंक या पद से नहीं मापा जा सकता। संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा कठिन और प्रतिष्ठित है, पर सफलता केवल इसे उत्तीर्ण करने में नहीं है। जीवन एक यात्रा है, न कि केवल किसी गंतव्य तक पहुँचने की दौड़। प्रतिभा और मेहनत महत्वपूर्ण हैं, पर परिस्थितियाँ, अवसर और संयोग भी परिणाम में भूमिका निभाते हैं। इसलिए यह सोचना कि केवल सफल होने वाला ही योग्य है, एक भ्रम है। हजारों ऐसे लोग असफल रह जाते हैं, जो उतने ही काबिल और मेहनती होते हैं। समाज, परिवार और मीडिया द्वारा किए जाने वाले महिमामंडन और तुलना असफल युवाओं के मन पर दबाव डालते हैं। वे स्वयं को कमतर समझने लगते हैं, जबकि असली शिक्षा यह है कि प्रत्येक व्यक्ति की यात्रा अद्वितीय होती है और हर किसी का योगदान मूल्यवान है। जीवन केवल पद या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन नहीं है। डॉक्टर, अभियंता, शिक्षक, उद्यमी या कलाकार—हर क्षेत्र में कार्य करने वाले लोग समाज और देश के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अगर हम अपने कर्म और सेवा की भावना के आधार पर जीवन जिएँ, तो वास्तविक परिवर्तन संभव है। असफलता जीवन का एक अनुभव मात्र है...
महाभारत में प्रतिज्ञा, धर्म और परिस्थितियाँ महाभारत केवल युद्ध की कथा नहीं है बल्कि यह धर्म, कर्तव्य और परिस्थितियों के संघर्ष की गहरी कहानी है। कई बार पात्रों ने ऐसी प्रतिज्ञाएँ लीं जो बाद में कठिन परिस्थितियों में टूटती दिखाई देती हैं। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण श्रीकृष्ण का है। उन्होंने कुरुक्षेत्र युद्ध से पहले वचन दिया था कि वे युद्ध में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं उठाएंगे, लेकिन जब भीष्म पितामह के भयंकर प्रहारों से अर्जुन संकट में पड़ गए तब कृष्ण रथ से उतरकर रथ का पहिया उठाकर भीष्म की ओर दौड़े। यह घटना दिखाती है कि उनके लिए सबसे बड़ा धर्म अधर्म का विनाश और अपने भक्त की रक्षा था। महाभारत में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं। भीष्म पितामह ने आजीवन हस्तिनापुर की सेवा की प्रतिज्ञा की थी इसलिए वे जानते हुए भी कि कौरव अधर्म पर हैं उनके पक्ष में युद्ध करते रहे। युधिष्ठिर जिन्हें सत्यवादी कहा जाता था उन्होंने द्रोणाचार्य को युद्ध से रोकने के लिए अश्वत्थामा हतः जैसा आधा सत्य कहा। इसी तरह भीम ने गदा युद्ध के नियम के विरुद्ध दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया क्योंकि वही उसे पराजित करने का एकमात्र तरीका था। ...