Skip to main content

फातिमा अल-फ़िहरी



फातिमा बिंत मुहम्मद अल-फ़हरिया अल-कुरैशिया  अरब मुस्लिम महिला थी, जिसे दुनिया की सबसे पुरानी मौजूदा, लगातार संचालित और पहली डिग्री देने वाली यूनिवर्सिटी बनवाने के रूप में मान्यता प्राप्त है। 859 ई। में फेज़ शहर , मोरक्को में अल- क़रवियिन विश्वविद्यालय बनवाया था। उन्हें उम्म अल-बान" के नाम से भी जाना जाता है

            
           फातिमा अल-फ़िहरी द्वारा बनाई गई              यूनिवर्सिटी अल-क़ुराईन यूनिवर्सिटी

            जन्म       फातिमा    800 ईस्वी

         कैरौअन शहर ख़िलाफ़त ए अब्बासिया 
                     (अब ट्यूनीशिया)

                   मौत      880    ईस्वी
          फेज़ शहर  (इदरीश वंश) अब मोरक्को

                 राष्ट्रीयता     मराकसिन

                  उपनाम       फातिमा 

                  नागरिकता  मोरक्कन

                 पदवी        उम्म अल-बान

                      प्रसिद्धि का कारण 
दुनिया की सबसे पहली यूनिवर्सिटी अल-क़रवियिन विश्वविद्यालय बनाने के कारण जो 1200 साल से अभी तक चल रहा है।

                    धर्म    इस्लाम

          
            माता-पिता    मुहम्मद अल-फ़हरिया

                 संबंधी     मरियम (बहन)

  जामिया अल-क़ुराईन और मस्जिद     क़रवियिन विश्वविद्यालय दुनिया की पहली   यूनिवर्सिटी जो आज भी चलन में है।

फातिमा अल-फ़िहरी अल कैरौअन या क़ुराईन शहर ट्यूनीशिया देश में पैदा हुई थीं। उनकी एक छोटी बहन मरियम भी थीं। वह एक रईस घराने से ताल्लुक रखती थीं। उनके पिता का नाम मुहम्मद अल-फ़हरिया था।
प्रारम्भिक जीवन

फातिमा अल-फ़िहरी का जन्म 800 ईस्वी के आसपास केयूरन शहर में हुआ था, जो आज के ट्यूनीशिया में है। वह अरब कुरैशी वंश की है, इसलिए नाम ,अल-कुरैशिया,कुरैशी एक' है। उसका परिवार केरौयन से फेस के बड़े प्रवास का हिस्सा था। हालांकि उसके परिवार ने अमीर नहीं बनाया, लेकिन उसके पिता, मोहम्मद अल-फ़िहरी, एक सफल व्यापारी बन गए।
वह और उसकी बहन मरियम पढ़ी-लिखी थीं और इस्लामिक न्यायशास्त्र फ़िक़ह और हदीस या पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) के रिकॉर्ड का अध्ययन करती थीं। दोनों फेज़ शहर गई। जहाँ पर फातिमा ने अल-क़रवाईयिन नामक मदरसे की स्थापना की और उनकी बहन मरियम ने अल-अंडालस मस्जिद की स्थापना की।
14 वीं शताब्दी के इतिहासकार इब्न अबी-जरारा द्वारा जो कुछ भी रिकॉर्ड किया गया था, उसे छोड़कर उसके निजी जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी है। यह काफी हद तक इस तथ्य के कारण है कि 1323 में अल-क़रवाईयिन पुस्तकालय को एक बड़ी आग लगी थी। अल-फ़िहरी शादीशुदा थी, लेकिन उनके पति और पिता दोनों की शादी के तुरंत बाद मृत्यु हो गई। उसके पिता ने फातिमा और उसकी बहन, अपने इकलौते बच्चों दोनों के लिए अपना धन छोड़ दिया था जिससे उन लोगों ने यूनिवर्सिटी और मस्जिद का निर्माण कराया
अल-अंडालस मस्जिद की स्थापना

अल-फ़िहरी ने अपने पिता से विरासत में मिली धनराशि का इस्तेमाल एक मस्जिद बनाने के लिए किया था, जिसे 845 ईस्वी में राजा याहिया इब्न मुहम्मद की देखरेख में बनाया गया था। उसने फिर इसे बनाया और इसके आकार को दोगुना करते हुए आसपास की जमीन खरीदी।

निर्माण परियोजना की देखरेख स्वयं फातिमा ने की। यद्यपि मस्जिद की वास्तुकला असाधारण है, अल-फ़िहरी ने इसे मामूली रूप से बनाने के लिए एक बिंदु बनाया। जैसा कि ट्यूनीशियाई इतिहासकार हसन होस्नी अब्देलवाहाब ने अपनी पुस्तक फेमस ट्यूनीशियाई महिला में उल्लेख किया है

उन्होंने कहा, उसने जो जमीन खरीदी थी, उसका इस्तेमाल करने के लिए प्रतिबद्ध है। उसने जमीन में गहरी खाई, पीली रेत, प्लास्टर, और पत्थर का उपयोग करने के लिए खोदा, ताकि दूसरों से संदेह न खींचे बहुत सारे संसाधनों का उपयोग करने के लिए

मस्जिद को बनने में 18 साल लगे। मोरक्को के इतिहासकार अब्देलहदी ताज़ी के अनुसार, अल-फहरी ने परियोजना के पूरा होने तक उपवास किया। जब यह खत्म हो गया, तो वह अंदर गई और अल्लाह से दुआ की, उनके आशीर्वाद के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने अपने गृहनगर कैरौयन के प्रवासियों के नाम पर इसका नाम रखा।
अल-क़रवियिन अभी भी अल-अंडालस के पास खड़ा है, जो मस्जिद फातिमा की बहन मरियम ने बनाया था।

अल-क़रवाईयिन विश्वविद्यालय की स्थापना

मस्जिद के पूरा होने के बाद, अल-फ़िहरी ने अल-क़रवैयिन विश्वविद्यालय को इबादत गाह के विस्तार के रूप में स्थापित कियायह दुनिया का सबसे पुराना लगातार संचालित विश्वविद्यालय है और कभी-कभी दुनिया के सबसे पुराने विश्वविद्यालय के रूप में जाना जाता है, जो कि अध्ययन के विभिन्न स्तरों के डिग्री सूचक का पहला संस्थान है। पेश किए गए पाठ्यक्रमों में इस्लामी अध्ययन, गणित, व्याकरण और चिकित्सा शामिल हैं।
अल-क़ारावियाय में पुस्तकालय को दुनिया में सबसे पुराना माना जाता है। हाल ही में इसे कनाडाई-मोरक्को के वास्तुकार अज़ीज़ा चौनी ने पुनर्निर्मित किया और मई 2016 में जनता के लिए फिर से खोल दिया। 4000 से अधिक पांडुलिपियों के पुस्तकालय के संग्रह में 9 वीं शताब्दी का कुरान और हदीसों का सबसे पहला संग्रहालय शामिल है।

 पुस्तकालय और विश्वविद्यालय कई वर्षों से चल रहे थे।

नालंदा या तक्षशिला नहीं बल्कि ये है सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी

क्या आप को पता है कि दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी कहां है? आपका जवाब तक्षशिला और नालंदा हो सकता है. मगर ये पूरी तरह से सही नहीं है. तक्षशिला में तो आज सिर्फ़ पुराने दौर के खंडहर ही बचे हैं.

कहते हैं कि वक़्त की आंधी में बहुत कुछ उड़ जाता है. सिर्फ़ निशान बाक़ी रह जाते हैं. दुनिया भर में बहुत-सी सभ्यताएं पनपीं. कुछ गांव-देहात वाली सभ्यताएं थीं तो कुछ सभ्यताओं में शहरों का विकास हुआ. जैसे कि सिंधु घाटी सभ्यता.

माना जाता है कि शहरीकरण की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता से ही हुई थी. लेकिन ये सभ्यता भी ख़ुद को बचा नहीं पाई और मिट्टी में मिल गई. हालांकि, इसके निशान आज भी मौजूद हैं, जो उस दौर की तरक़्क़ी की कहानी बयान करते हैं. दुनिया के कमोबेश हर कोने में ऐसे तारीख़ी शहर आबाद हैं, जो सदियों की इंसानी सभ्यता की कहानी हमें सुनाते हैं.

क्या आप फ़ास के बारे में जानते हैं?
आज आप को ऐसे ही एक शहर की सैर पर ले चलते हैं. इस शहर का नाम है फ़ास, जो मोरक्को का सबसे पुराना और दूसरा बड़ा शहर है. और फ़ास शहर की सबसे बड़ी ख़ूबी है यहां की यूनिवर्सिटी.

फ़ास या फ़ास मदीना शहर नौवीं सदी में बसा था और आज तक आबाद है. इस शहर को फलने-फूलने का मौक़ा मिला तेरहवीं और चौदहवीं सदी में. ये वो दौर था, जब मोरक्को में मेरिनेड राजवंश का शासन था. अरब देशों के तमाम ऐतिहासिक शहरों में से फ़ास शहर सबसे बेहतर हालत में है.

आज यहां के लोगों के रहन-सहन में नए ज़माने का तेवर ज़रूर आ गया है. लेकिन शहर का अंदाज़, उसका रखरखाव आज भी आपको गुज़रे हुए ज़माने में जाने का तजुर्बा देता है. फ़ास शहर की भूलभुलैया जैसी गलियां, एक-दूसरे से ऐसे जुड़ी हैं कि आपको शहर के आख़िरी कोने तक ले जाएं. शहर के चौराहों पर बड़े फ़व्वारे हैं. छोटे-छोटे बाज़ार आज भी लगते हैं.

हालांकि, इस शहर में कई जगह बड़ी पुरानी इमारतें खंडहर बन चुकी हैं. लेकिन मोरक्को की सरकार इस शहर के ऐतिहासिक ठिकानों के रख-रखाव पर ख़ूब पैसा खर्च कर रही हैं. माना जाता है कि ये शहर दुनिया का सबसे पुराना कार-फ़्री शहरी इलाक़ा है. आवाजाही के लिए यहां आज भी पुराने तरीक़े के साधनों जैसे इक्का गाड़ी, तांगे और गधों का इस्तेमाल होता है.

अगर आप फ़ास शहर की ख़ूबसूरती का नज़ारा करना चाहते हैं, तो बेहतर होगा कि आप शहर में पैदल घूमें. हर एक इमारत की दीवार पर क़ुरान की आयतें बहुत ख़ूबसूरती से उकेरी हुई नज़र आएंगी. आधी दीवारों पर चीनी मिट्टी के टाइल से खूबसूरत डिज़ाइन आप देख सकते हैं.

फ़ास शहर की ख़ूबसूरती और इसका ऐतिहासिक रंग-रूप आपको बरबस अपनी तरफ़ ख़ींचता है.

इस शहर में आने वालों की दिलचस्पी का सबसे बड़ा केंद्र एक इमारत है. ये इमारत दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी की है.

लंबे समय से चल रही यूनिवर्सिटी

फ़ास शहर के बीचों-बीच है, जामिया अल-क़ुराईन. अल क़ुराईन को दुनिया की सबसे पुरानी और लंबे समय से लगातार चल रही यूनिवर्सिटी कहा जाता है. यूनेस्को और गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ ये दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी है, जहां आज भी इल्म हासिल करने का सिलसिला जारी है.

कई रिकॉर्ड्स के मुताबिक़ ये दुनिया की पहली यूनिवर्सिटी है, जहां डिग्री देने का चलन शुरू हुआ. हालांकि, भारत में तक्षशिला और नालंदा जैसी यूनिवर्सिटी थीं. लेकिन इनमें पढ़ाई बंद हो गई थी. वहीं जामिया अल क़ुराईन में 1200 साल से भी पहले से लगातार पढ़ाई हो रही है. अरब देशों में ये तालीम का सबसे पुराना केंद्र है.

इस यूनिवर्सिटी की इमारत ख़ूबसूरती की नई इबारत जैसी लिखती मालूम होती है. लेकिन इसके वजूद में आने की कहानी और भी दिलचस्प है. कहा जाता है कि नौवीं सदी के मध्य में जिस वक्त फ़ास को इदरीस वंश की राजधानी के तौर पर बसाने का काम चल रहा था, तभी क़ुराईन शहर से फ़ातिमा नाम की एक रईसज़ादी अपने पिता और बहन मरियम के साथ यहां आकर बस गईं. क़ुराईन शहर आज के ट्यनीशिया में पड़ता है.

फ़ातिमा ने फ़ास मदीना में ही शादी की. कुछ समय बाद, जब फ़ातिमा के अब्बा गुज़र गए तो दोनों बहनों ने तय किया कि जिस समाज में उन्हें पनाह मिली वो उन पर कर्ज़ है. उन्हें ये क़र्ज़ उन्हें अदा करना चाहिए. लिहाज़ा फ़ातिमा ने तो जामिया अल क़ुराईन बनवाने की ठानी. यहां पर लोगों की पढ़ाई के लिए ही नहीं, उनके रहने के लिए भी बड़ा यूनिवर्सिटी कॉम्पलेक्स भी तैयार कराया गया.

वहीं फ़ातिमा की बहन मरियम ने विरासत में मिली सारी दौलत अंदालूसिन नाम की मस्जिद बनावाने में ख़र्च कर दी. इस मस्जिद में एक वक़्त में क़रीब 20 हज़ार लोग नमाज़ अदा कर सकते हैं.

फ़ातिमा ने बनवाई यूनिवर्सिटी
मस्जिद की सजावट सज्जा आला दर्जे की है. मरियम ने अपना सारा पैसा एक मस्जिद बनवाने में ही ख़र्च किया. जबकि फ़ातिमा ने अपने हिस्से के पैसे से यूनिवर्सिटी तामीर की, ताकि यहां के लोगों को तालीम मिल सके. बताया जाता है कि फ़ातिमा ने यूनिवर्सिटी बन जाने तक रोज़े रखे. जामिया अल क़ुराईन 18 साल में बनकर तैयार हुई.

चूंकि मस्जिद में ग़ैर मुस्लिमों को दाख़िल होने की इजाज़त नहीं है, लिहाज़ा वो बाहर से ही इन इमारतों की सुंदरता निहार सकते हैं. या किसी झरोखे से अंदर की ख़ूबसूरती का दीदार कर सकते हैं. मस्जिद और यूनिवर्सिटी में चारों ओर दरवाज़े हैं. छत पर हाथ से चित्रकारी की गई है, जिसमें क़ुदरती रंगों का इस्तेमाल हुआ है. हालांकि, अंदर ही अंदर घूमने पर अंदाज़ा नहीं होता कि ये इमारतें इतनी विशाल हैं. जबकि ऊपर से देखने पर अंदाज़ा होता है कि इमारत कितने बड़े रक़बे में फैली है.

जामिया अल क़ुराईन की छत गहरे हरे रंगे के टाइलों से तैयार की गई है. लगता है कि दूर तक हरियाली ही हरियाली है. इमारत के फ़र्श पर कई रंगों वाले टाइल बिछे हैं. इससे यूं गुमान होता है फ़र्श पर रंगों की बौछार कर दी गई है.

फ़ातिमा के बाद मोरक्कों में कई राजवंशों का दौर आया. सभी ने अपने-अपने मुताबिक़ यहां कि इमारतों में रद्दो बदल की. जैसे बारहवीं सदी में यहां अल-मुराविद राजवंश का शासन था. उन्होंने मस्जिद का सहन बड़ा कराया और दीवारों पर अपने दौर की चित्रकारी कराई.

अल-मुराविद के बाद अल-मोहाद राजवंश का शासन हुआ. उन्होंने लंबे समय तक शासन किया और दक्षिण स्पेन तक अपना राज क़ायम किया. लिहाज़ा इनके दौर में जो बदलाव हुए उनमें स्पेनिश वास्तुकला की झलक भी मिलती है.
अल-क़ुराईन यूनिवर्सिटी की शुरुआत एक मदरसे के तौर पर हुई थी, लेकिन आज यहां दुनिया भर के लोग तालीम हासिल करने आते हैं. आज ये यूनिवर्सिटी अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त है. यहां भाषा, व्याकरण, संगीत, कानून, सूफीवाद, मेडिकल साइंस, ज्योतिष जैसे विषयों की पढ़ाई होती है. हालांकि, शुरुआती दौर में यहां सिर्फ़ दीन की ही तालीम दी जाती थी.

इस यूनिवर्सिटी से बड़े-बड़े विद्वान निकले हैं. जैसे बारहवीं सदी के मशहूर दार्शनिक इब्न-ए-रुशायद अल-सब्ती, मोहम्मद इब्न-अल-हज्ज-अल-अब्दारी, अबू इमरान अल फ़ासी, लियो अफ्रीकानस. इनके अलावा पोप सिल्वेस्टर और बेल्जियम के विद्वान निकोलस क्लेनार्ट्स ने भी जामिया अल क़ुराईन का दौरा किया था.

इसमें नहीं पढ़ पाती थीं महिलाएं
1359 में मेरिनेड राजवंश ने यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी को मज़बूत करने का काम किया. इसी राजवंश के दौर में शुरूआती मध्यकालीन दौर की किताबें दुनिया भर से ढूंढ़ कर यहां लाई गईं. यहां क़रीब चार हज़ार ऐसे दस्तावेज़ और हस्तलिपियां हैं, जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलते. इन्हीं दस्तावेज़ों को पढ़ने दुनिया भर से लोग जामिया अल क़ुराईन आते हैं.

दरअसल, अरब देश वो इलाक़े हैं, जहां से आधुनिक सभ्यता की शुरुआत हुई थी. यही वजह है कि यहां पुराना दौर समझने का ख़ज़ाना मौजूद है. मुसलमानों और इस्लाम को समझाने वाले बेहतरीन दस्तावेज़ अरब देशों की लाइब्रेरी में मौजूद हैं, लेकिन अफ़सोस की बात है कि कुछ लोगों की नासमझी के चलते ये बेमोल ख़ज़ाना बर्बाद हो रहा है. जैसे इराक़ के मोसुल स्थित लाइब्रेरी पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है.

हालांकि, जो लोग इन दस्तावेज़ों की क़ीमत समझते हैं वो अब इनका डिजिटाइज़ेशन कर रहे हैं ताकि आने वाली नस्लों तक ये सरमाया बचा रहे.

अल क़ुराईन मदरसे का एक हिस्सा 2016 में फिर से लोगों के लिए खोला गया है. साथ ही कुवैत के अरब बैंक ने मोरक्को की कल्चरल मिनिस्ट्री को बड़ी रक़म ग्रांट के तौर पर दी है ताकि इस्लामिक सभ्यता के इस पुराने केंद्र को बचाया जा सके.
दिलचस्प बात है कि इस यूनिवर्सिटी की स्थापना एक महिला ने की थी, लेकिन सामाजिक रवायतों के चलते यहां एक भी महिला को तालीम हासिल करने का मौक़ा नहीं मिल सका. हालांकि, अब ये दीवार गिर गई है. आज इस यूनिवर्सिटी में हर मज़हब के मर्द और औरत पढ़ने के लिए आ रहे हैं.

अटलांटिक और भूमध्य सागर के किनारे बसा मोरक्को अरब और इस्लामिक सभ्यता का बड़ा केंद्र है. इसे अरब इतिहास की राजधानी कहें तो ग़लत नहीं होगा. अरब सभ्यता के इस ताज के नगीना का दर्जा फ़ास शहर को ही मिलेगा.








Comments

Popular posts from this blog

Social Justice UPSC CIVIL SERVICES EXAMINATION

Social Justice is an important component of the UPSC Civil Services Examination, especially in General Studies Paper II. It focuses on ensuring equality, fairness, and dignity for all sections of society, particularly the vulnerable and marginalized. Social justice aims to remove inequalities based on caste, gender, religion, region, disability, and economic status. It is closely linked to constitutional values, governance, welfare schemes, and inclusive development. The foundation of social justice in India lies in the Constitution. The Preamble emphasizes justice social, economic, and political. Fundamental Rights guarantee equality before law, prohibition of discrimination, abolition of untouchability, and protection of life and liberty. Directive Principles of State Policy guide the state to promote welfare, reduce inequalities, provide adequate livelihood, and protect weaker sections. Together, these provisions create a framework for an equitable society. One of the ce...

Indian Art And Culture

Indian Art and Culture is an important subject in the UPSC Civil Services Examination, especially in the Preliminary Examination and General Studies Paper I of Mains. It covers the rich cultural heritage of India from ancient to modern times. The syllabus includes Indian architecture, sculpture, paintings, music, dance forms, literature, religions, philosophy, and cultural institutions. Topics such as temple architecture, Buddhist stupas, Indo-Islamic architecture, classical dances like Bharatanatyam and Kathak, classical music traditions, folk art forms, and UNESCO cultural heritage sites are significant areas of study. Understanding the evolution of culture through different historical periods and its regional diversity is essential. Preparation strategy involves building clear conceptual knowledge, focusing on features, characteristics, and examples rather than memorizing excessive facts. Linking art and culture with history and current affairs, such as GI tags, cultural...

Indian Polity

Indian Polity is a core subject in the UPSC Civil Services Examination and forms a major part of General Studies Paper II in both Prelims and Mains. It primarily deals with the Constitution of India, its features, amendments, governance structure, and functioning of political institutions. The foundation of this subject lies in understanding the Constitution adopted in 1950, including its salient features such as federalism, parliamentary system, fundamental rights, directive principles of state policy, and fundamental duties. Key institutions include the Parliament, President, Prime Minister, Council of Ministers, Supreme Court, High Courts, Election Commission, and Comptroller and Auditor General. The roles and responsibilities of these bodies, along with concepts like separation of powers, judicial review, and constitutional amendments, are important areas of study. Preparation strategy involves building strong conceptual clarity from the Constitution itself, linking sta...