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फिलिस्तीन इजरायल के संबंध में महात्मा गांधी जी का विचार

महात्मा गांधी फिलिस्तीन में यहूदी राष्ट्र-राज्य की स्थापना का विचारिक रूप से विरोध करते थे, इज़रायल और फिलिस्तीन के बीच चल रहे संघर्ष एवं तनाव के संदर्भ में उनके विचार काफी चर्चा में है।

गांधी द्वारा फिलिस्तीन में यहूदी राष्ट्र-राज्य के विरोध का कारण:
यूरोप में यहूदी लोगों की दुर्दशा:
1930 और 1940 के दशक में एडॉल्फ हिटलर के नेतृत्त्व वाले नाज़ी शासन के तहत यूरोप में यहूदियों को अत्यधिक उत्पीड़न एवं भेदभाव का सामना करना पड़ा।
नाज़ियों के शासन के दौरान व्यवस्थित रूप से लगभग छह मिलियन यहूदियों का नरसंहार किया गया, उन्हें नज़रबंदी शिविरों में रहने या निर्वासित होने को मज़बूर होना पड़ा।
यहूदियों के प्रति गांधी की सहानुभूति:
गांधीजी को यहूदी लोगों के प्रति अपार सहानुभूति थी, इन लोगों को ऐतिहासिक रूप से उनके धर्म के कारण प्रताड़ित किया गया था।
गांधीजी ने पाया कि यूरोप में यहूदियों और भारत में अछूतों के साथ होने वाले व्यवहार में काफी समानताएँ हैं तथा उन्होंने दोनों समुदायों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार की काफी आलोचनाएँ भी कीं।
गांधी जर्मनी द्वारा यहूदियों के उत्पीड़न को लेकर बहुत चिंतित थे और उनका मानना था कि इस तरह के उत्पीड़न को रोकने के लिये अगर जर्मनी के साथ युद्ध करना पड़े तो यह उचित होगा।
ज़ायोनी आंदोलन और उसके लक्ष्य:
19वीं सदी के अंत में फिलिस्तीन में यहूदी लोगों के लिये एक राष्ट्रीय मातृभूमि की स्थापना के लक्ष्य के साथ ज़ायोनी आंदोलन की शुरुआत हुई।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद इस आंदोलन को और बल मिला, साथ ही इसे वर्ष 1917 की बाल्फोर घोषणा (जिसके द्वारा फिलिस्तीन में एक यहूदी राष्ट्र-राज्य की स्थापना हेतु समर्थन किया गया था) का प्रोत्साहन भी प्राप्त हुआ।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वर्ष 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को अलग-अलग यहूदी और अरब राज्यों में विभाजित करने वाली एक विभाजन योजना का प्रस्ताव रखा, जिसके अनुसार यरुशलम एक अंतर्राष्ट्रीय शहर होगा।
यहूदी नेताओं ने इस योजना को स्वीकार कर लिया किंतु अरब द्वारा इसे अस्वीकार कर दिया गया, जिससे हिंसा भड़की।
14 मई, 1948 को इज़रायल को आधिकारिक तौर पर एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया।
यहूदी राष्ट्र-राज्य के प्रति गांधी का विरोध:
गांधीजी ने फिलिस्तीन में यहूदी राष्ट्र-राज्य को गलत और अमानवीय मानते हुए इसका विरोध किया। उनका मानना था कि यहूदी मातृभूमि की स्थापना के लिये मूल अरब आबादी को विस्थापित करना मानवता के खिलाफ अपराध कृत्य होगा।
गांधीजी को लगा कि यहूदी केवल "अरबों की सद्भावना से" फिलिस्तीन में बस सकते हैं और इसके लिये उन्हें "ब्रिटिशों के साथ जुड़ाव को कम करना होगा"।
उनका मानना था कि कोई भी धार्मिक कृत्य, जैसे यहूदियों का फिलिस्तीन लौटना, गंभीरता से नहीं बल्कि अरबों की सद्भावना के साथ लागू होना चाहिये।
गांधी का मानना था कि फिलिस्तीन में यहूदी मातृभूमि की अवधारणा दुनिया भर में यहूदी अधिकारों की लड़ाई का खंडन करती है। उन्होंने सवाल किया कि यदि फिलिस्तीन यहूदियों का एकमात्र घर है तो क्या वे दुनिया के उन हिस्सों को छोड़ेंगे, जहाँ पर वे पहले से बसे हुए हैं।
गांधी के रुख का भारत की इज़राइल-फिलिस्तीन नीति पर प्रभाव:
गांधीजी की राय और उनके स्वयं के साम्राज्यवाद-विरोध का भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे दशकों तक उभरते राष्ट्र की विदेश नीति को आकार देने के लिये ज़िम्मेदार थे, जिसके कारण भारत ने फिलिस्तीन को विभाजित करने वाले संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 181 के खिलाफ वोट किया।
17 सितंबर 1950 को, भारत ने आधिकारिक तौर पर इज़राइल राज्य को मान्यता दी, लेकिन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के द्वारा वर्ष 1992 में आधिकारिक राजनयिक संबंध स्थापित किये।
भारत, फिलिस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को एकमात्र फिलिस्तीनी प्रतिनिधि के रूप में स्वीकार करने वाले पहले गैर-अरब देशों में से एक था। वर्ष 1988 में भारत ने फिलिस्तीन को एक राज्य के रूप में मान्यता दी।
हालाँकि समय के साथ भारत की नीति में भी कुछ बदलाव आए, जो उसके रणनीतिक और आर्थिक हितों को दर्शाते हैं।
हाल ही में भारत इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित करते हुए, दो-राज्य समाधान या ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ (Two-State Solution) को प्राथमिकता देने और शांतिपूर्ण तरीके से दोनों देशों के लिये आत्मनिर्णय के अधिकार के साथ डी-हाईफनेशन (Dehyphenation) नीति स्थापित करने की ओर बढ़ गया है।

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