भारतीय संविधान की प्रस्तावना
हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय;
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता;
प्रतिष्ठा और अवसर की समता;
प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1
भारत अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा। भारत के राज्यक्षेत्र में राज्य, संघ राज्य क्षेत्र तथा भारत द्वारा अर्जित अन्य क्षेत्र शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 2
संसद कानून बनाकर नए राज्यों को भारत संघ में प्रवेश दे सकती है या नए राज्यों की स्थापना कर सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3
संसद नए राज्यों का गठन कर सकती है तथा किसी राज्य का क्षेत्र, सीमा या नाम बदल सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 4
अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर्गत बनाए गए कानूनों के अनुसार पहली और चौथी अनुसूची में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 5
संविधान लागू होने के समय भारतीय नागरिकता से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 6
पाकिस्तान से भारत आए कुछ व्यक्तियों की नागरिकता से संबंधित प्रावधान बताता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 7
भारत से पाकिस्तान गए कुछ व्यक्तियों की नागरिकता से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 8
भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के कुछ व्यक्तियों की नागरिकता से संबंधित प्रावधान बताता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 9
स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त करने वाला व्यक्ति अनुच्छेद 5, 6 या 8 के आधार पर भारतीय नागरिक नहीं माना जाएगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 10
नागरिकता संबंधी प्रावधानों के अधीन भारतीय नागरिकता के अधिकारों की निरंतरता सुनिश्चित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 11
संसद को नागरिकता के अर्जन, समाप्ति और अन्य संबंधित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12
मौलिक अधिकारों के संदर्भ में राज्य की परिभाषा निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 13
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले कानून उल्लंघन की सीमा तक अमान्य होंगे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14
कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15
धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। संविधान में निर्धारित विशेष प्रावधानों की अनुमति भी देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 16
सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है और संविधान के अनुसार आरक्षण सहित विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17
अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में आचरण को दंडनीय बनाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 18
सैन्य और शैक्षणिक उपाधियों के अपवाद को छोड़कर राज्य द्वारा उपाधियाँ प्रदान करने पर प्रतिबंध लगाता है तथा विदेशी उपाधियों के संबंध में प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19
नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, संघ बनाने, देश में आवागमन, निवास तथा व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है। इन पर संविधान के अनुसार उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20
अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण देता है। इसमें पूर्वव्यापी दंडात्मक कानून, एक ही अपराध के लिए दोबारा अभियोजन और स्वयं के विरुद्ध गवाही देने से संरक्षण शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करता है। कानून द्वारा स्थापित उचित प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति को इनसे वंचित नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21A
6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22
गिरफ्तारी और निरोध के मामलों में संरक्षण प्रदान करता है तथा गिरफ्तार व्यक्ति को कारण जानने और वकील से परामर्श करने जैसे अधिकार देता है। इसमें कुछ अपवाद भी हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 23
मानव तस्करी, बेगार और अन्य प्रकार के बलात् श्रम पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 24
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों और अन्य खतरनाक रोजगारों में काम पर लगाने पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25
सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 26
धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक और परोपकारी संस्थाएँ स्थापित करने, धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने तथा संपत्ति रखने और उसका प्रशासन करने का अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 27
किसी विशेष धर्म के प्रचार या पालन-पोषण के लिए विशेष रूप से विनियोजित कर देने के लिए बाध्य किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 28
कुछ शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा और धार्मिक उपासना में भाग लेने से संबंधित नियम निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 29
नागरिकों के किसी वर्ग को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार देता है तथा राज्य द्वारा संचालित या सहायता प्राप्त संस्थानों में प्रवेश के संबंध में कुछ आधारों पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30
धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 31
संपत्ति के अनिवार्य अर्जन से संबंधित मौलिक अधिकार वाला यह अनुच्छेद निरस्त कर दिया गया है। संपत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 300A के अंतर्गत संवैधानिक अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 32
मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी कर सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 33
संसद को सशस्त्र बलों, लोक व्यवस्था बनाए रखने वाले बलों, खुफिया संगठनों और संबंधित सेवाओं के सदस्यों के मौलिक अधिकारों में निर्धारित सीमा तक संशोधन करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 34
किसी क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू होने की स्थिति में किए गए कुछ कार्यों के संबंध में संसद को क्षतिपूर्ति या संरक्षण संबंधी कानून बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 35
भाग III के कुछ विषयों पर कानून बनाने की विशेष शक्ति संसद को देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 36
राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के भाग में राज्य की परिभाषा स्पष्ट करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 37
राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को न्यायालय द्वारा लागू न किए जा सकने वाला, लेकिन शासन संचालन में मूलभूत बताता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 38
राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने तथा असमानताओं को कम करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39
राज्य को आजीविका के पर्याप्त साधन, संसाधनों का जनहित में वितरण, समान कार्य के लिए समान वेतन और बच्चों तथा श्रमिकों के संरक्षण जैसे उद्देश्यों की दिशा में नीति बनाने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 39A
समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 40
राज्य को ग्राम पंचायतों का गठन करने और उन्हें स्वशासन की आवश्यक शक्तियाँ देने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 41
राज्य की आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर काम, शिक्षा तथा बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी और दिव्यांगता की स्थिति में सार्वजनिक सहायता की व्यवस्था करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 42
काम की न्यायसंगत और मानवीय परिस्थितियाँ तथा मातृत्व राहत सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 43
श्रमिकों के लिए निर्वाह योग्य वेतन, सम्मानजनक जीवन स्तर और अवकाश सहित उचित कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 43A
उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 43B
सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यप्रणाली, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44
राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 45
छह वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा उपलब्ध कराने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46
अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के शैक्षणिक तथा आर्थिक हितों को बढ़ावा देने और उन्हें सामाजिक अन्याय तथा शोषण से बचाने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 47
पोषण स्तर, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना राज्य का कर्तव्य बताता है। यह औषधीय उपयोग को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेय और नशीले पदार्थों के सेवन पर रोक लगाने का प्रयास करने का भी निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48
राज्य को कृषि और पशुपालन को आधुनिक तथा वैज्ञानिक आधार पर व्यवस्थित करने और गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और भारवाही पशुओं के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48A
राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा तथा सुधार करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 49
राष्ट्रीय महत्व के घोषित स्मारकों, स्थानों और कलात्मक या ऐतिहासिक महत्व की वस्तुओं को नुकसान, विनाश, हटाए जाने या निर्यात से बचाने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 50
राज्य को सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51
राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंध बनाए रखने, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने तथा विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51A
भारत के प्रत्येक नागरिक के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख करता है। इनमें संविधान और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान, देश की एकता की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 52
भारत में राष्ट्रपति का पद स्थापित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 53
संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है और उसके प्रयोग का प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 54
राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल की संरचना निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 55
राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति निर्धारित करता है, जिसमें राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में एकरूपता और राज्यों तथा संघ के बीच संतुलन का प्रयास किया जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 56
राष्ट्रपति के कार्यकाल को पाँच वर्ष निर्धारित करता है तथा पद छोड़ने और पद से हटाए जाने से संबंधित प्रावधान बताता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 57
वर्तमान या पूर्व राष्ट्रपति को संविधान के अनुसार पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र बनाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 58
राष्ट्रपति निर्वाचित होने की योग्यताएँ निर्धारित करता है, जिनमें भारतीय नागरिकता, 35 वर्ष की आयु और लोकसभा सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 59
राष्ट्रपति के पद की शर्तें निर्धारित करता है। राष्ट्रपति संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता और कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता, निर्धारित अपवादों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 60
राष्ट्रपति के पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 61
संविधान के उल्लंघन के लिए राष्ट्रपति पर महाभियोग चलाने की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 62
राष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने से पहले या पद रिक्त होने पर चुनाव कराने की समय-सीमा निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 63
भारत में उपराष्ट्रपति के पद का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 64
उपराष्ट्रपति को राज्यसभा का पदेन सभापति बनाता है। राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने की अवधि में वह राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों का पालन नहीं करता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 65
राष्ट्रपति का पद रिक्त होने या राष्ट्रपति के कार्य करने में असमर्थ होने पर उपराष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 66
उपराष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया निर्धारित करता है। उसका चुनाव संसद के दोनों सदनों के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति और एकल संक्रमणीय मत द्वारा करते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 67
उपराष्ट्रपति के कार्यकाल, त्यागपत्र और पद से हटाने की प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 68
उपराष्ट्रपति का कार्यकाल समाप्त होने से पहले या पद रिक्त होने पर चुनाव कराने की समय-सीमा निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 69
उपराष्ट्रपति के पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 70
ऐसी परिस्थितियों में राष्ट्रपति के कार्यों के निर्वहन की व्यवस्था करने की संसद को शक्ति देता है, जिनका उल्लेख संविधान में अन्यत्र नहीं है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 71
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों के निर्णय का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 72
राष्ट्रपति को कुछ मामलों में दंड माफ करने, दंडादेश को स्थगित करने, कम करने या बदलने की शक्ति देता है। इसमें कोर्ट मार्शल के मामले, संघ की कार्यपालिका शक्ति से संबंधित कानूनों के अपराध और मृत्युदंड के मामले शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 73
संघ की कार्यपालिका शक्ति के विस्तार को निर्धारित करता है, जो सामान्यतः उन विषयों तक है जिन पर संसद कानून बना सकती है, संविधान के प्रावधानों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 74
राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है। राष्ट्रपति सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 75
प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति, कार्यकाल, सामूहिक उत्तरदायित्व तथा मंत्रियों से संबंधित अन्य प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 76
भारत के महान्यायवादी के पद का प्रावधान करता है। वह भारत सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 77
भारत सरकार के कार्यों के संचालन और सरकारी आदेशों को राष्ट्रपति के नाम से जारी करने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 78
प्रधानमंत्री के कर्तव्यों का उल्लेख करता है, जिनमें राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद के निर्णयों और प्रशासन से संबंधित जानकारी देना शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 79
राष्ट्रपति और संसद के दोनों सदनों, राज्यसभा तथा लोकसभा, को मिलाकर भारतीय संसद की संरचना निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 80
राज्यसभा की संरचना निर्धारित करता है। इसमें राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि तथा राष्ट्रपति द्वारा नामित 12 सदस्य शामिल होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 81
लोकसभा की संरचना और राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों से प्रतिनिधित्व के आधार निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 82
प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा की सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन में समायोजन का प्रावधान करता है, जो लागू संवैधानिक व्यवस्थाओं के अधीन है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 83
संसद के दोनों सदनों की अवधि निर्धारित करता है। राज्यसभा स्थायी सदन है, जबकि लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष होता है, जब तक पहले भंग न कर दी जाए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 84
संसद की सदस्यता के लिए योग्यताएँ निर्धारित करता है, जिनमें भारतीय नागरिकता और निर्धारित न्यूनतम आयु शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 85
राष्ट्रपति को संसद के सत्र बुलाने, सत्रावसान करने और लोकसभा भंग करने की शक्ति देता है। दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 86
राष्ट्रपति को संसद के किसी एक सदन या दोनों सदनों को संबोधित करने तथा संदेश भेजने का अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 87
राष्ट्रपति के विशेष अभिभाषण का प्रावधान करता है, जो प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र में दिया जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 88
मंत्रियों और भारत के महान्यायवादी को संसद के किसी भी सदन की कार्यवाही में बोलने तथा भाग लेने का अधिकार देता है, लेकिन केवल इस अनुच्छेद के आधार पर मतदान का अधिकार नहीं देता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 89
राज्यसभा के सभापति और उपसभापति के पदों का प्रावधान करता है। भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 90
राज्यसभा के उपसभापति का पद रिक्त होने, त्यागपत्र देने और पद से हटाए जाने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 91
राज्यसभा के सभापति का पद रिक्त होने या उनके अनुपस्थित रहने पर उपसभापति अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 92
राज्यसभा में सभापति या उपसभापति को उनके पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके पीठासीन होने पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 93
लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 94
लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद रिक्त होने, त्यागपत्र देने तथा पद से हटाए जाने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 95
लोकसभा के अध्यक्ष का पद रिक्त होने या उनके अनुपस्थित रहने पर उपाध्यक्ष अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 96
लोकसभा में अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को उनके पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके पीठासीन होने पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 97
संसद के दोनों सदनों के सभापति, उपसभापति, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन तथा भत्तों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 98
संसद के प्रत्येक सदन के लिए अलग सचिवालय कर्मचारियों की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 99
संसद के प्रत्येक सदस्य के लिए सदन में अपना स्थान ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान लेना अनिवार्य करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 100
संसद के सदनों में मतदान, रिक्तियों के बावजूद कार्य करने की क्षमता और गणपूर्ति से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 101
संसद के सदस्य की सीट रिक्त होने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। इसमें दोनों सदनों की सदस्यता, संसद और राज्य विधानमंडल की एक साथ सदस्यता तथा त्यागपत्र से संबंधित नियम शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 102
संसद सदस्य बनने या बने रहने की अयोग्यताएँ निर्धारित करता है। इनमें लाभ का पद, सक्षम न्यायालय द्वारा घोषित मानसिक अस्वस्थता, दिवालियापन, विदेशी नागरिकता और कानून के अंतर्गत निर्धारित अयोग्यताएँ शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 103
संसद सदस्य की अयोग्यता से संबंधित प्रश्न पर राष्ट्रपति के निर्णय का प्रावधान करता है। राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करके उसके अनुसार निर्णय लेते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 104
शपथ लेने से पहले या अयोग्य होते हुए संसद में बैठने और मतदान करने पर दंड का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105
संसद, उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों तथा उन्मुक्तियों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 106
संसद सदस्यों के वेतन और भत्तों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 107
संसद में विधेयकों को प्रस्तुत करने और पारित करने की सामान्य प्रक्रिया निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 108
कुछ परिस्थितियों में लोकसभा और राज्यसभा की संयुक्त बैठक बुलाने का प्रावधान करता है, ताकि विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध दूर किया जा सके।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 109
धन विधेयक पारित करने की विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है। राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती। वह 14 दिनों के भीतर केवल सिफारिशें दे सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 110
धन विधेयक की परिभाषा निर्धारित करता है। इसमें कर, सरकारी उधार, भारत की संचित निधि और उनसे संबंधित निर्दिष्ट विषय शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 111
संसद द्वारा पारित विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। राष्ट्रपति गैर-धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 112
केंद्र सरकार के वार्षिक वित्तीय विवरण का प्रावधान करता है, जिसे केंद्रीय बजट कहा जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 113
वार्षिक वित्तीय विवरण में शामिल अनुदान माँगों पर लोकसभा में विचार और मतदान की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 114
भारत की संचित निधि से धन निकालने के लिए विनियोग विधेयक और कानून का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 115
अनुपूरक, अतिरिक्त और अधिक अनुदानों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है, जब स्वीकृत धन अपर्याप्त हो या अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 116
लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान का प्रावधान करता है। इनके माध्यम से विशेष परिस्थितियों में सरकारी खर्च के लिए धन स्वीकृत किया जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 117
वित्तीय विधेयकों को प्रस्तुत करने और पारित करने से संबंधित विशेष प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 118
संसद के प्रत्येक सदन को अपनी कार्यवाही और कार्य संचालन के नियम बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 119
वित्तीय कार्य समय पर पूरा करने के लिए संसद की प्रक्रिया और कार्य संचालन को कानून द्वारा विनियमित करने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 120
संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। सामान्यतः हिंदी या अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता है, संवैधानिक प्रावधानों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 121
सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर संसद में चर्चा को प्रतिबंधित करता है, सिवाय उस प्रस्ताव के संदर्भ में जो न्यायाधीश को हटाने से संबंधित हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 122
संसद की कार्यवाही को केवल प्रक्रिया की कथित अनियमितता के आधार पर न्यायालय में चुनौती देने से संरक्षण प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 123
जब संसद के दोनों सदन एक साथ सत्र में न हों और तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तब राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है। संसद के पुनः एकत्र होने के बाद अध्यादेश निर्धारित अवधि तक ही प्रभावी रहता है, यदि पहले समाप्त न हो जाए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124
सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना, संरचना, न्यायाधीशों की नियुक्ति और पद से हटाने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 125
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्तों और सेवा संबंधी शर्तों का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 126
भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त होने या उनके कार्य करने में असमर्थ होने पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 127
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या उपलब्ध न होने पर योग्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को तदर्थ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 128
भारत के मुख्य न्यायाधीश को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से सर्वोच्च न्यायालय के योग्य पूर्व न्यायाधीशों को बैठने और कार्य करने के लिए आमंत्रित करने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 129
सर्वोच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 130
सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य स्थान दिल्ली निर्धारित करता है। मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की स्वीकृति से अन्य स्थान भी निर्धारित कर सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 131
संघ और राज्यों के बीच तथा राज्यों के आपसी कुछ कानूनी विवादों में सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकार क्षेत्र प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 132
संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न वाले मामलों में उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 133
दीवानी मामलों में निर्धारित शर्तों के अधीन उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 134
निर्धारित परिस्थितियों में आपराधिक मामलों में उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 134A
उच्च न्यायालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए प्रमाणपत्र देने की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 135
संविधान लागू होने से पहले संघीय न्यायालय के पास रहे कुछ अधिकारों और शक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रयोग किए जाने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 136
सर्वोच्च न्यायालय को भारत के किसी न्यायालय या अधिकरण के निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति से अपील स्वीकार करने की शक्ति देता है। सशस्त्र बलों से संबंधित कुछ न्यायालयों और अधिकरणों के मामले इसके अपवाद हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 137
सर्वोच्च न्यायालय को अपने निर्णयों और आदेशों की समीक्षा करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 138
संसद को कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विस्तार करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 139
संसद को कानून द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को कुछ अतिरिक्त उद्देश्यों के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करने का अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 139A
सर्वोच्च न्यायालय को समान कानूनी प्रश्नों वाले कुछ मामलों को उच्च न्यायालयों से अपने पास या एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 140
संसद को सर्वोच्च न्यायालय के प्रभावी कार्य संचालन के लिए आवश्यक अतिरिक्त सहायक शक्तियाँ कानून द्वारा प्रदान करने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 141
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142
सर्वोच्च न्यायालय को अपने समक्ष लंबित मामलों में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री जारी करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 143
राष्ट्रपति को सार्वजनिक महत्व के कानून या तथ्य के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से राय लेने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 144
भारत के सभी नागरिक और न्यायिक प्राधिकारी सर्वोच्च न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 145
सर्वोच्च न्यायालय को राष्ट्रपति की स्वीकृति के अधीन अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 146
सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति, सेवा शर्तों तथा प्रशासनिक खर्चों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 147
इस भाग में सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या स्पष्ट करता है। इसमें संविधान की व्याख्या के प्रश्नों के लिए भारत शासन अधिनियम, 1935 और भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 जैसे ऐतिहासिक कानूनों के संदर्भ भी शामिल हो सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 148
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के पद का प्रावधान करता है। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और उन्हें संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही पद से हटाया जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 149
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के कर्तव्यों और शक्तियों से संबंधित है। संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार CAG केंद्र और राज्य सरकारों के खातों की जाँच करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 150
केंद्र और राज्य सरकारों के खातों का प्रारूप निर्धारित करता है। खातों का प्रारूप राष्ट्रपति, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की सलाह पर निर्धारित करते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 151
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों को राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रावधान करता है। केंद्र की रिपोर्ट संसद के समक्ष और राज्य की रिपोर्ट राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 152
भाग VI में राज्य की परिभाषा स्पष्ट करता है। इस भाग में जम्मू-कश्मीर राज्य का विशेष उल्लेख मूल संविधान में था, जिसे बाद के संवैधानिक परिवर्तनों ने प्रभावित किया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 153
प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल का प्रावधान करता है। एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 154
राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित करता है, जिसका प्रयोग संविधान के अनुसार सीधे या अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से किया जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 155
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर सहित अधिपत्र से किए जाने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 156
राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष है, लेकिन उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक वह पद पर बना रह सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 157
राज्यपाल नियुक्त होने की योग्यताएँ निर्धारित करता है। व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए और उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 158
राज्यपाल के पद की शर्तें निर्धारित करता है। राज्यपाल संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता और कोई अन्य लाभ का पद धारण नहीं कर सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 159
राज्यपाल के पद ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान लेने की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 160
विशेष परिस्थितियों में राज्यपाल के कार्यों के निर्वहन के लिए राष्ट्रपति को आवश्यक व्यवस्था करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 161
राज्यपाल को राज्य की कार्यपालिका शक्ति के अंतर्गत आने वाले कानूनों से संबंधित अपराधों में दंड माफ करने, स्थगित करने, कम करने या बदलने की शक्ति देता है। मृत्युदंड के मामले में राज्यपाल की शक्ति सीमित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 162
राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार निर्धारित करता है। यह सामान्यतः उन विषयों तक होती है जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है, संविधान के प्रावधानों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 163
राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद का प्रावधान करता है, सिवाय उन मामलों के जहाँ संविधान राज्यपाल को विवेकाधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 164
मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति, पद की शर्तों तथा राज्य मंत्रिपरिषद की विधानसभा के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 165
राज्य के महाधिवक्ता के पद का प्रावधान करता है। महाधिवक्ता राज्य सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 166
राज्य सरकार के कार्यों के संचालन और सरकारी आदेशों को राज्यपाल के नाम से जारी करने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 167
मुख्यमंत्री के कर्तव्यों का उल्लेख करता है, जिनमें राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के निर्णयों और प्रशासन से संबंधित जानकारी देना शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 168
राज्य विधानमंडल की संरचना निर्धारित करता है। इसमें राज्यपाल और राज्य के एक या दो सदन शामिल होते हैं, जैसा संविधान में निर्धारित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 169
संसद को किसी राज्य में विधान परिषद स्थापित करने या समाप्त करने की शक्ति देता है, यदि संबंधित राज्य विधानसभा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 170
राज्य विधानसभाओं की संरचना और निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर सदस्यों के निर्वाचन से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 171
राज्य विधान परिषद की संरचना निर्धारित करता है। इसके सदस्यों का चुनाव स्थानीय निकायों, स्नातकों, शिक्षकों और विधानसभा के सदस्यों द्वारा होता है तथा कुछ सदस्यों को राज्यपाल नामित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 172
राज्य विधानसभाओं का सामान्य कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित करता है। विधान परिषद स्थायी सदन है, जिसके लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 173
राज्य विधानमंडल की सदस्यता के लिए योग्यताएँ निर्धारित करता है, जिनमें भारतीय नागरिकता और निर्धारित न्यूनतम आयु शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 174
राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र बुलाने, सत्रावसान करने और विधानसभा भंग करने की शक्ति देता है। दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 175
राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के किसी एक सदन या दोनों सदनों को संबोधित करने तथा संदेश भेजने का अधिकार देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 176
राज्यपाल के विशेष अभिभाषण का प्रावधान करता है, जो प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र और प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र में दिया जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 177
राज्य के मंत्रियों और महाधिवक्ता को राज्य विधानमंडल की कार्यवाही में बोलने तथा भाग लेने का अधिकार देता है, लेकिन केवल इस अनुच्छेद के आधार पर मतदान का अधिकार नहीं देता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 178
राज्य विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 179
राज्य विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद रिक्त होने, त्यागपत्र देने और पद से हटाए जाने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 180
विधानसभा अध्यक्ष का पद रिक्त होने या उनके अनुपस्थित रहने पर उपाध्यक्ष अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 181
विधानसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को उनके पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके पीठासीन होने पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 182
राज्य विधान परिषद के सभापति और उपसभापति के चुनाव का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 183
राज्य विधान परिषद के सभापति और उपसभापति के पद रिक्त होने, त्यागपत्र देने तथा पद से हटाए जाने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 184
विधान परिषद के सभापति का पद रिक्त होने या उनके अनुपस्थित रहने पर उपसभापति अथवा अन्य व्यक्ति द्वारा उनके कर्तव्यों का निर्वहन करने की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 185
विधान परिषद के सभापति या उपसभापति को उनके पद से हटाने के प्रस्ताव पर विचार के दौरान उनके पीठासीन होने पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 186
राज्य विधानमंडल के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति और उपसभापति के वेतन तथा भत्तों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 187
राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन के लिए सचिवालय कर्मचारियों की व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 188
राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदस्य के लिए सदन में स्थान ग्रहण करने से पहले शपथ या प्रतिज्ञान लेना अनिवार्य करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 189
राज्य विधानमंडल में मतदान, रिक्तियों के बावजूद कार्य करने की क्षमता और गणपूर्ति से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 190
राज्य विधानमंडल के सदस्यों की सीट रिक्त होने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। इसमें दो सदनों की सदस्यता और विधानसभा तथा विधान परिषद की सदस्यता से संबंधित नियम शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 191
राज्य विधानमंडल की सदस्यता के लिए अयोग्यताएँ निर्धारित करता है, जिनमें लाभ का पद, सक्षम न्यायालय द्वारा घोषित मानसिक अस्वस्थता, दिवालियापन, विदेशी नागरिकता और कानून के अंतर्गत निर्धारित अयोग्यताएँ शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 192
राज्य विधानमंडल के सदस्य की अयोग्यता से संबंधित प्रश्न पर राज्यपाल के निर्णय का प्रावधान करता है। राज्यपाल निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करके उसके अनुसार निर्णय लेते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 193
शपथ लेने से पहले या अयोग्य होते हुए राज्य विधानमंडल में बैठने और मतदान करने पर दंड का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 194
राज्य विधानमंडल, उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों तथा उन्मुक्तियों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 195
राज्य विधानमंडल के सदस्यों के वेतन और भत्तों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 196
राज्य विधानमंडल में विधेयकों को प्रस्तुत करने और पारित करने की सामान्य प्रक्रिया निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 197
धन विधेयकों को छोड़कर अन्य विधेयकों पर विधान परिषद की शक्तियों को सीमित करता है। विधान परिषद किसी विधेयक को स्थायी रूप से रोक नहीं सकती और निर्धारित प्रक्रिया के बाद विधानसभा की स्थिति प्रभावी होती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 198
राज्य में धन विधेयक पारित करने की विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता है। विधान परिषद धन विधेयक पर केवल सिफारिशें दे सकती है और उसे 14 दिनों के भीतर लौटाना होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 199
राज्य में धन विधेयक की परिभाषा निर्धारित करता है। इसमें कर, सरकारी उधार, राज्य की संचित निधि और उनसे संबंधित निर्दिष्ट विषय शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 200
राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल की स्वीकृति, स्वीकृति रोकने, राष्ट्रपति के विचार के लिए विधेयक सुरक्षित रखने और कुछ गैर-धन विधेयकों को पुनर्विचार के लिए लौटाने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 201
राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति की स्वीकृति या अस्वीकृति से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 202
राज्य सरकार के वार्षिक वित्तीय विवरण का प्रावधान करता है। इसे राज्य का बजट कहा जाता है, जिसमें अनुमानित आय और व्यय का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 203
राज्य के बजट में शामिल अनुदान माँगों पर विधानसभा में विचार और मतदान की प्रक्रिया निर्धारित करता है। कुछ व्यय राज्य की संचित निधि पर भारित होते हैं और उन पर मतदान नहीं होता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 204
राज्य की संचित निधि से धन निकालने के लिए विनियोग विधेयक और कानून का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 205
राज्य में अनुपूरक, अतिरिक्त और अधिक अनुदानों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है, जब स्वीकृत धन अपर्याप्त हो या अतिरिक्त व्यय की आवश्यकता हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 206
राज्य में लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान का प्रावधान करता है। इनके माध्यम से विशेष परिस्थितियों में सरकारी खर्च के लिए धन स्वीकृत किया जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 207
राज्य के वित्तीय विधेयकों को प्रस्तुत करने और पारित करने से संबंधित विशेष प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 208
राज्य विधानमंडल के प्रत्येक सदन को अपनी कार्यवाही और कार्य संचालन के नियम बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 209
राज्य विधानमंडल में वित्तीय कार्य समय पर पूरा करने के लिए प्रक्रिया और कार्य संचालन को कानून द्वारा विनियमित करने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 210
राज्य विधानमंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। हिंदी, अंग्रेजी या राज्य की अधिकृत भाषा का प्रयोग संवैधानिक प्रावधानों के अधीन किया जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 211
राज्य विधानमंडल में सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के आचरण पर चर्चा को प्रतिबंधित करता है, सिवाय उस प्रस्ताव के संदर्भ में जो न्यायाधीश को हटाने से संबंधित हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 212
राज्य विधानमंडल की कार्यवाही को केवल प्रक्रिया की कथित अनियमितता के आधार पर न्यायालय में चुनौती देने से संरक्षण प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 213
जब राज्य विधानमंडल के दोनों सदन एक साथ सत्र में न हों और तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तब राज्यपाल को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है। अध्यादेश विधानमंडल के पुनः एकत्र होने के बाद निर्धारित अवधि तक ही प्रभावी रहता है, यदि पहले समाप्त न हो जाए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 214
प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय का प्रावधान करता है। संसद कानून द्वारा दो या अधिक राज्यों या राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के लिए साझा उच्च न्यायालय भी स्थापित कर सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 215
प्रत्येक उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायालय घोषित करता है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 216
उच्च न्यायालय की संरचना निर्धारित करता है। इसमें मुख्य न्यायाधीश और राष्ट्रपति द्वारा आवश्यक समझे जाने वाले अन्य न्यायाधीश शामिल होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 217
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, पद की शर्तों और सेवानिवृत्ति की आयु से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सामान्यतः 62 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 218
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने से संबंधित कुछ प्रावधान लागू करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 219
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को पद ग्रहण करने से पहले राज्यपाल या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के समक्ष शपथ या प्रतिज्ञान लेने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 220
स्थायी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के सेवानिवृत्त होने के बाद भारत में किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष वकालत करने पर कुछ प्रतिबंध लगाता है। सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों के समक्ष वकालत करने की अनुमति रहती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 221
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्तों और सेवा संबंधी शर्तों का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 222
राष्ट्रपति को भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 223
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त होने या उनके कार्य करने में असमर्थ होने पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224
उच्च न्यायालय में कार्यभार बढ़ने या लंबित मामलों के कारण अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 224A
भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को योग्य पूर्व न्यायाधीशों को उच्च न्यायालय में बैठने और कार्य करने के लिए आमंत्रित करने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 225
संविधान लागू होने से पहले उच्च न्यायालयों के मौजूदा अधिकार क्षेत्र, शक्तियों और कार्यवाही से संबंधित प्रावधानों को बनाए रखता है, संविधान और लागू कानूनों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226
उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा अन्य कानूनी अधिकारों के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 227
उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति प्रदान करता है, सशस्त्र बलों से संबंधित न्यायालयों या अधिकरणों के अपवाद के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 228
यदि अधीनस्थ न्यायालय में लंबित किसी मामले में संविधान की व्याख्या से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न हो, तो उच्च न्यायालय उस मामले को अपने पास मँगाकर उसका निर्णय कर सकता है या कानून के प्रश्न का निपटारा कर मामला वापस भेज सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 229
उच्च न्यायालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति तथा उनकी सेवा शर्तों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। न्यायालय के प्रशासनिक खर्चों का भी इसमें प्रावधान है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 230
संसद को कानून द्वारा उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विस्तार किसी संघ राज्य क्षेत्र तक करने या उससे बाहर करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 231
संसद को दो या अधिक राज्यों अथवा राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के लिए साझा उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 232
यह अनुच्छेद निरस्त कर दिया गया है। वर्तमान संविधान में इसके अंतर्गत कोई अलग प्रभावी प्रावधान लागू नहीं है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 233
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापन और पदोन्नति से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करके ये नियुक्तियाँ करते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 234
जिला न्यायाधीशों के अलावा राज्य की न्यायिक सेवा में व्यक्तियों की भर्ती से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है। नियुक्तियाँ राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 235
जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित करता है। इसमें पदस्थापन, पदोन्नति और अवकाश जैसे विषय शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 236
इस भाग में प्रयुक्त “जिला न्यायाधीश” और “न्यायिक सेवा” जैसे शब्दों की परिभाषा स्पष्ट करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 237
राज्यपाल को अधिसूचना द्वारा इस अध्याय के कुछ प्रावधानों को राज्य में कुछ वर्गों के मजिस्ट्रेटों पर लागू करने की शक्ति देता है, आवश्यक संशोधनों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 238
यह अनुच्छेद भाग-B राज्यों से संबंधित था। संविधान के सातवें संशोधन, 1956 द्वारा इसे हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 239
यह केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन से संबंधित है। इनके प्रशासन की जिम्मेदारी राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से निभाई जाती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 239A
यह संसद को कुछ केंद्रशासित प्रदेशों, विशेषकर पुडुचेरी, के लिए विधानमंडल या मंत्रिपरिषद अथवा दोनों बनाने का प्रावधान करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 239AA
यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए विशेष प्रावधान करता है। इसमें विधानसभा, मंत्रिपरिषद और उपराज्यपाल की भूमिका निर्धारित की गई है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 239AB
यदि दिल्ली में संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार शासन चलाना संभव न हो, तो राष्ट्रपति आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 239B
यह कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा के सत्र में न होने पर प्रशासक को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है, निर्धारित संवैधानिक शर्तों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 240
यह राष्ट्रपति को कुछ केंद्रशासित प्रदेशों की शांति, प्रगति और सुशासन के लिए विनियम बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 241
यह संसद को केंद्रशासित प्रदेशों के लिए उच्च न्यायालय स्थापित करने या किसी उच्च न्यायालय को उनका न्यायालय घोषित करने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 242
यह अनुच्छेद कूर्ग से संबंधित था। संविधान के सातवें संशोधन, 1956 द्वारा इसे हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243
यह पंचायतों से संबंधित भाग में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों और अभिव्यक्तियों की परिभाषाएँ देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243A
यह ग्राम सभा को राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित शक्तियों और कार्यों का प्रयोग करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243B
यह ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर पर पंचायतों के गठन का प्रावधान करता है। छोटे राज्यों में मध्यवर्ती स्तर की पंचायत के लिए अपवाद हो सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243C
यह पंचायतों की संरचना, सदस्यों के चयन और प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243D
यह पंचायतों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243E
यह पंचायतों का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित करता है और समय से पहले भंग होने पर चुनाव से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243F
यह पंचायतों का सदस्य बनने या बने रहने के लिए अयोग्यता से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243G
यह राज्य विधानमंडल को पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने हेतु शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ सौंपने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243H
यह पंचायतों को कर, शुल्क, पथकर आदि लगाने तथा पंचायत निधियों के गठन से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243I
यह राज्यपाल को प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्य वित्त आयोग गठित करने का प्रावधान करता है, जो पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243J
यह पंचायतों के खातों के रखरखाव और उनकी लेखा-परीक्षा से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243K
यह पंचायत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग को देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243L
यह केंद्रशासित प्रदेशों में पंचायत संबंधी संवैधानिक प्रावधानों के लागू होने का तरीका निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243M
यह कुछ क्षेत्रों और राज्यों में पंचायत संबंधी प्रावधानों के लागू होने से अपवाद निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243N
यह पंचायतों से संबंधित पहले से लागू कानूनों और मौजूदा पंचायतों को निर्धारित अवधि तक जारी रखने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243O
यह पंचायत चुनावों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगाता है। चुनाव को सामान्यतः चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243P
यह नगरपालिकाओं से संबंधित भाग में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों और अभिव्यक्तियों की परिभाषाएँ देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243Q
यह नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद और नगर निगम के गठन का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243R
यह नगरपालिकाओं की संरचना और सदस्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243S
यह तीन लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाली नगरपालिकाओं में वार्ड समितियों के गठन का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243T
यह नगरपालिकाओं में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243U
यह नगरपालिकाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित करता है तथा समय से पहले भंग होने पर चुनाव से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243V
यह नगरपालिका का सदस्य बनने या बने रहने के लिए अयोग्यता से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243W
यह राज्य विधानमंडल को नगरपालिकाओं को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने हेतु शक्तियाँ और जिम्मेदारियाँ सौंपने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243X
यह नगरपालिकाओं को कर, शुल्क, पथकर आदि लगाने तथा नगरपालिका निधियों के गठन से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243Y
यह राज्य वित्त आयोग को नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने और वित्तीय संसाधनों के बँटवारे पर सिफारिश देने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243Z
यह नगरपालिकाओं के खातों के रखरखाव और उनकी लेखा-परीक्षा से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZA
यह नगरपालिका चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग को देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZB
यह केंद्रशासित प्रदेशों में नगरपालिका संबंधी संवैधानिक प्रावधानों के लागू होने का तरीका निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZC
यह कुछ क्षेत्रों में नगरपालिका संबंधी प्रावधानों के लागू होने से अपवाद निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZD
यह प्रत्येक जिले में जिला योजना समिति के गठन का प्रावधान करता है, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं की योजनाओं को समन्वित करती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZE
यह प्रत्येक महानगरीय क्षेत्र में महानगरीय योजना समिति के गठन का प्रावधान करता है, जो क्षेत्र के लिए विकास योजना तैयार करती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZF
यह नगरपालिकाओं से संबंधित पहले से लागू कानूनों और मौजूदा नगरपालिकाओं को निर्धारित अवधि तक जारी रखने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZG
यह नगरपालिका चुनावों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगाता है। चुनाव को सामान्यतः चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZH
यह सहकारी समितियों से संबंधित भाग में प्रयुक्त प्रमुख शब्दों और अभिव्यक्तियों की परिभाषाएँ देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZI
यह सहकारी समितियों के गठन, पंजीकरण, विनियमन और स्वायत्त संचालन से संबंधित कानून बनाने का आधार प्रदान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZJ
यह सहकारी समिति के निदेशक मंडल के सदस्यों की संख्या, कार्यकाल और पदाधिकारियों से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZK
यह सहकारी समितियों के निदेशक मंडल के चुनाव और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZL
यह सहकारी समिति के निदेशक मंडल के निलंबन या अधिक्रमण तथा अंतरिम प्रबंधन से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZM
यह सहकारी समितियों के खातों की लेखा-परीक्षा से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZN
यह सहकारी समितियों की वार्षिक आम सभा की बैठक आयोजित करने से संबंधित प्रावधान निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZO
यह सहकारी समिति के सदस्यों को समिति की गतिविधियों और अभिलेखों से संबंधित जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है, निर्धारित कानूनों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZP
यह सहकारी समितियों को वार्षिक विवरण और आवश्यक अभिलेख संबंधित प्राधिकरण के पास जमा करने से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZQ
यह सहकारी समितियों से संबंधित अपराधों और दंडों के लिए कानून बनाने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZR
यह बहुराज्यीय सहकारी समितियों पर सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के लागू होने का तरीका निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZS
यह केंद्रशासित प्रदेशों में सहकारी समितियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के लागू होने का तरीका निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 243ZT
यह सहकारी समितियों से संबंधित पहले से लागू कानूनों को निर्धारित अवधि तक जारी रखने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 244
यह अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है। पाँचवीं और छठी अनुसूची इनके प्रशासन के लिए विशेष प्रावधान करती हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 244A
यह संसद को असम के कुछ जनजातीय क्षेत्रों को मिलाकर स्वायत्त राज्य बनाने तथा उसके लिए विधानमंडल या मंत्रिपरिषद अथवा दोनों की व्यवस्था करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 245
यह संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों के क्षेत्रीय विस्तार से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 246
यह संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर संसद तथा राज्य विधानमंडलों की कानून बनाने की शक्तियाँ निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 246A
यह संसद और राज्य विधानमंडलों को वस्तु एवं सेवा कर (GST) के संबंध में कानून बनाने की शक्ति देता है। अंतरराज्यीय व्यापार में GST पर संसद को विशेष अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 247
यह संसद को संघ सूची के विषयों से संबंधित कानूनों के बेहतर प्रशासन के लिए अतिरिक्त न्यायालय स्थापित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 248
यह अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ संसद को देता है। जिन विषयों का उल्लेख संघ, राज्य या समवर्ती सूची में नहीं है, उन पर संसद कानून बना सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 249
यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से राष्ट्रीय हित में प्रस्ताव पारित करे, तो संसद राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 250
राष्ट्रीय आपातकाल लागू रहने के दौरान संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 251
यह अनुच्छेद 249 या 250 के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून और राज्य कानून में टकराव होने पर संसद के कानून को प्रभावी बनाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 252
यदि दो या अधिक राज्य अनुरोध करें, तो संसद उनके लिए राज्य सूची के विषय पर कानून बना सकती है। अन्य राज्य बाद में उस कानून को अपना सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 253
यह संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों, समझौतों और सम्मेलनों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 254
समवर्ती सूची के विषय पर केंद्रीय और राज्य कानूनों में टकराव होने पर सामान्यतः केंद्रीय कानून प्रभावी होता है। राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त राज्य कानून कुछ परिस्थितियों में उस राज्य में प्रभावी रह सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 255
यह निर्धारित करता है कि कुछ संवैधानिक सिफारिशों या पूर्व स्वीकृतियों की कमी से कानून केवल इसी आधार पर अमान्य नहीं होगा, यदि आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार स्वीकृति प्राप्त हो गई हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 256
राज्यों का दायित्व है कि वे संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित करें। केंद्र सरकार इस उद्देश्य से राज्यों को निर्देश दे सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 257
राज्यों को अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करना होता है कि केंद्र की कार्यपालिका शक्ति में बाधा न आए। संविधान के अनुसार केंद्र कुछ मामलों में राज्यों को निर्देश दे सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 258
राष्ट्रपति राज्य सरकार की सहमति से केंद्र के कार्य राज्य सरकार या उसके अधिकारियों को सौंप सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 258A
राज्यपाल केंद्र सरकार की सहमति से राज्य के कार्य केंद्र सरकार या उसके अधिकारियों को सौंप सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 259
यह अनुच्छेद हटा दिया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 260
भारत सरकार किसी विदेशी क्षेत्र की सरकार के साथ समझौते के आधार पर वहाँ के कुछ प्रशासनिक, विधायी या न्यायिक कार्य कर सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 261
भारत के पूरे क्षेत्र में सार्वजनिक कार्यों, अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को मान्यता दी जाती है। इनके प्रमाण और प्रभाव से संबंधित नियम संसद बना सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 262
यह संसद को अंतरराज्यीय नदियों और नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण से जुड़े विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 263
यह राष्ट्रपति को राज्यों के बीच समन्वय और विवादों की जाँच तथा सलाह देने के लिए अंतरराज्यीय परिषद स्थापित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 264
यह वित्त संबंधी भाग में प्रयुक्त शब्द “वित्त आयोग” आदि की व्याख्या के लिए प्रासंगिक परिभाषाएँ निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 265
किसी भी कर को कानून के अधिकार के बिना न लगाया जा सकता है और न वसूला जा सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 266
यह भारत और राज्यों की संचित निधियों तथा लोक लेखों का प्रावधान करता है। सरकार की अधिकांश प्राप्तियाँ संचित निधि में जमा होती हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 267
यह भारत और राज्यों की आकस्मिक निधियों का प्रावधान करता है, जिनसे अप्रत्याशित और तत्काल व्यय के लिए अग्रिम राशि दी जा सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 268
यह कुछ संघीय शुल्कों को केंद्र द्वारा लगाए जाने और राज्यों द्वारा वसूलने तथा अपने पास रखने से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 269
यह कुछ करों को केंद्र द्वारा लगाए और वसूले जाने तथा राज्यों को सौंपे जाने से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 269A
यह अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान होने वाली वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर GST लगाने और उसके वितरण से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 270
यह केंद्र द्वारा लगाए गए कुछ करों को केंद्र और राज्यों के बीच बाँटने का प्रावधान करता है। GST से संबंधित वितरण भी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार होता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 271
यह संसद को कुछ संघीय करों और शुल्कों पर अधिभार लगाने की शक्ति देता है। अनुच्छेद में निर्दिष्ट GST से संबंधित अपवाद लागू होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 272
यह अनुच्छेद हटा दिया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 273
यह जूट और जूट उत्पादों के निर्यात शुल्क के बदले असम, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल को अनुदान देने से संबंधित ऐतिहासिक प्रावधान था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 274
राज्यों के हितों को प्रभावित करने वाले कुछ कर संबंधी विधेयकों और संशोधनों को संसद में प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 275
यह संसद द्वारा राज्यों को सहायता अनुदान देने का प्रावधान करता है। अनुसूचित जनजातियों के कल्याण और अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष अनुदान भी दिए जा सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 276
यह राज्यों और स्थानीय निकायों को व्यवसाय, व्यापार, आजीविका और रोजगार पर कर लगाने की अनुमति देता है, निर्धारित संवैधानिक सीमा के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 277
संविधान लागू होने से पहले वैध रूप से लगाए जा रहे कुछ कर और शुल्क तब तक जारी रह सकते हैं, जब तक संसद कानून द्वारा अन्य व्यवस्था न करे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 278
यह अनुच्छेद हटा दिया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 279
यह शुद्ध आय की गणना और करों के वितरण से संबंधित कुछ वित्तीय प्रावधान निर्धारित करता है। शुद्ध आय के निर्धारण में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की भूमिका भी निर्धारित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 279A
यह GST परिषद की स्थापना करता है। परिषद केंद्र और राज्यों को GST से संबंधित दरों, छूटों और अन्य प्रमुख विषयों पर सिफारिशें देती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 280
यह राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकतानुसार पहले वित्त आयोग गठित करने का प्रावधान करता है। आयोग केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण तथा अनुदानों पर सिफारिशें देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 281
यह वित्त आयोग की सिफारिशों और उन पर की गई कार्रवाई के विवरण को संसद के दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 282
केंद्र या राज्य सरकार किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनुदान दे सकती है, भले ही वह उद्देश्य उसके विधायी क्षेत्र में सीधे न आता हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 283
यह भारत और राज्यों की संचित निधियों, आकस्मिक निधियों तथा लोक लेखों में जमा धन की अभिरक्षा, भुगतान और निकासी के नियमों से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 284
यह न्यायालयों और लोक सेवकों द्वारा प्राप्त उन धनराशियों की अभिरक्षा से संबंधित है, जिन्हें सरकार की संचित निधि में जमा नहीं किया जाता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 285
संघ की संपत्ति सामान्यतः राज्य के कराधान से मुक्त होती है, जब तक संसद कानून द्वारा अन्यथा प्रावधान न करे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 286
यह राज्यों को राज्य के बाहर या आयात-निर्यात के दौरान होने वाली वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर कर लगाने से संबंधित संवैधानिक प्रतिबंध निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 287
यह बिजली की खपत या बिक्री पर कुछ प्रकार के राज्य करों से केंद्र सरकार द्वारा उपयोग की जाने वाली बिजली को छूट देने का प्रावधान करता है, निर्धारित शर्तों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 288
यह कुछ मामलों में जल या बिजली से संबंधित करों से छूट का प्रावधान करता है, विशेषकर उन संस्थाओं के संबंध में जिन्हें संविधान में निर्दिष्ट किया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 289
राज्य की संपत्ति और आय सामान्यतः केंद्रीय कराधान से मुक्त होती है। हालांकि, संसद व्यापार या व्यवसाय से संबंधित कुछ गतिविधियों पर कर लगाने का प्रावधान कर सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 290
यह कुछ खर्चों और पेंशन संबंधी दायित्वों के समायोजन से संबंधित है, जिनका भुगतान भारत या राज्यों की संचित निधियों से किया जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 290A
यह केरल और तमिलनाडु राज्यों की संचित निधियों से कुछ देवस्वम निधियों को वार्षिक भुगतान करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 291
यह अनुच्छेद पूर्व रियासतों के शासकों के प्रिवी पर्स से संबंधित था। इसे संविधान के 26वें संशोधन, 1971 द्वारा समाप्त कर दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 292
यह भारत सरकार को भारत की संचित निधि की सुरक्षा पर या उसके भीतर निर्धारित सीमाओं के अनुसार उधार लेने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 293
यह राज्यों द्वारा भारत के भीतर उधार लेने से संबंधित है। केंद्र से ऋण बकाया होने पर कुछ परिस्थितियों में राज्य को केंद्र की सहमति आवश्यक होती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 294
यह संविधान लागू होने के समय भारत सरकार और राज्यों की संपत्ति, अधिकारों, दायित्वों तथा देनदारियों के उत्तराधिकार से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 295
यह पूर्व भारतीय राज्यों और प्रांतों की संपत्ति, अधिकारों, दायित्वों तथा देनदारियों के उत्तराधिकार से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 296
यह बिना उत्तराधिकारी या वैध मालिक के छोड़ी गई संपत्ति के सरकार में निहित होने से संबंधित है। ऐसी संपत्ति की प्राप्ति संविधान में निर्धारित नियमों के अनुसार होती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 297
यह भारत के क्षेत्रीय जल, महाद्वीपीय शेल्फ और विशेष आर्थिक क्षेत्र में स्थित मूल्यवान संसाधनों को संघ में निहित करता है, संविधान और लागू कानूनों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 298
यह केंद्र और राज्य सरकारों को व्यापार या व्यवसाय करने तथा संपत्ति अर्जित करने, रखने और उसका निपटान करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 299
यह केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से किए जाने वाले सरकारी अनुबंधों के स्वरूप और निष्पादन से संबंधित नियम निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300
यह भारत सरकार और राज्य सरकारों के नाम से मुकदमा दायर करने तथा उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 300A
किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल कानून के अधिकार के तहत ही वंचित किया जा सकता है। संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 301
भारत के पूरे क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और आवागमन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 302
यह संसद को सार्वजनिक हित में भारत के भीतर व्यापार, वाणिज्य और आवागमन पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 303
यह संसद और राज्य विधानमंडलों को व्यापार और वाणिज्य के मामलों में राज्यों के बीच भेदभाव करने से रोकता है, कुछ संवैधानिक अपवादों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 304
यह राज्यों को अन्य राज्यों से आने वाली वस्तुओं पर कर लगाने तथा सार्वजनिक हित में व्यापार और वाणिज्य पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है, निर्धारित संवैधानिक शर्तों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 305
यह कुछ मौजूदा कानूनों और राज्य के एकाधिकार संबंधी कानूनों को अनुच्छेद 301 तथा 303 के प्रावधानों से संरक्षण देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 306
यह अनुच्छेद हटा दिया गया है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 307
यह संसद को अनुच्छेद 301 से 304 के उद्देश्यों को लागू करने के लिए प्राधिकरण नियुक्त करने और उसके कार्य निर्धारित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 308
यह भाग में प्रयुक्त “राज्य” शब्द की व्याख्या से संबंधित है, जिसमें जम्मू-कश्मीर के संबंध में ऐतिहासिक अपवाद भी था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 309
यह संसद और राज्य विधानमंडलों को सरकारी सेवाओं में भर्ती तथा सेवा की शर्तों को नियंत्रित करने वाले कानून बनाने की शक्ति देता है। कानून बनने तक निर्धारित प्राधिकारी नियम बना सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 310
यह संघ और राज्यों के अधीन सिविल सेवकों के पद पर बने रहने के सिद्धांत को निर्धारित करता है, जो राष्ट्रपति या राज्यपाल के प्रसादपर्यंत होता है; यह सिद्धांत संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311
यह सरकारी सिविल सेवकों को बर्खास्त करने, पद से हटाने या पदावनत करने के संबंध में सुरक्षा प्रदान करता है। सामान्यतः उचित जाँच और सुनवाई के अवसर की व्यवस्था आवश्यक है, कुछ अपवादों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 312
यह राज्यसभा द्वारा राष्ट्रीय हित में विशेष प्रस्ताव पारित किए जाने पर संसद को अखिल भारतीय सेवाएँ बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 312A
यह संसद को कुछ सेवाओं के अधिकारियों की सेवा शर्तों में परिवर्तन या उन्हें समाप्त करने की शक्ति देता है, विशेषकर संविधान लागू होने से पहले नियुक्त कुछ अधिकारियों के संबंध में।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 313
यह संविधान लागू होने से पहले के सेवा संबंधी कानूनों और नियमों को तब तक जारी रखने का प्रावधान करता है, जब तक सक्षम प्राधिकारी उन्हें बदल या निरस्त न कर दे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 314
यह अनुच्छेद पूर्व भारतीय सिविल सेवाओं के कुछ अधिकारियों को संरक्षण देने से संबंधित था। इसे 28वें संविधान संशोधन, 1972 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315
यह संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है। दो या अधिक राज्य संयुक्त लोक सेवा आयोग भी बना सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 316
यह संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष तथा सदस्यों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 317
यह लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या सदस्य को पद से हटाने और निलंबित करने की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 318
यह राष्ट्रपति और राज्यपाल को लोक सेवा आयोगों के सदस्यों की संख्या तथा सेवा की शर्तों के संबंध में विनियम बनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 319
यह लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के पद छोड़ने के बाद अन्य सरकारी पदों पर नियुक्ति से संबंधित प्रतिबंध निर्धारित करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 320
यह संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों के कार्य निर्धारित करता है, जिनमें भर्ती परीक्षाएँ आयोजित करना तथा नियुक्ति, पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों पर परामर्श देना शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 321
यह संसद या राज्य विधानमंडल को कानून द्वारा लोक सेवा आयोगों के अतिरिक्त कार्य निर्धारित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 322
यह संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों के खर्चों को संबंधित संचित निधि पर भारित करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 323
यह संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल को प्रस्तुत करने तथा उन्हें संबंधित विधानमंडल के समक्ष रखवाने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 323A
यह संसद को सरकारी सेवाओं और सार्वजनिक पदों से संबंधित भर्ती तथा सेवा शर्तों के विवादों के निपटारे के लिए प्रशासनिक अधिकरण स्थापित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 323B
यह संसद या सक्षम राज्य विधानमंडल को कराधान, औद्योगिक विवाद, भूमि सुधार और अन्य निर्दिष्ट विषयों के लिए अधिकरण स्थापित करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324
यह भारत में चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति भारत निर्वाचन आयोग को देता है। इसमें संसद, राज्य विधानमंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव शामिल हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 325
प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी। धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति को मतदाता सूची से बाहर नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326
लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होते हैं। भारत का 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का नागरिक, कानून के तहत अयोग्य न होने पर, मतदाता के रूप में पंजीकृत हो सकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 327
यह संसद को संसद और राज्य विधानमंडलों के चुनावों से संबंधित कानून बनाने की शक्ति देता है, जिसमें मतदाता सूची और निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन शामिल है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 328
यह राज्य विधानमंडल को अपने चुनावों से संबंधित कानून बनाने की शक्ति देता है, बशर्ते संसद के कानूनों और संविधान के प्रावधानों से टकराव न हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 329
यह निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन और सीटों के आवंटन से संबंधित कानूनों को न्यायालयों में चुनौती देने पर प्रतिबंध लगाता है। चुनाव को सामान्यतः निर्धारित चुनाव याचिका के माध्यम से ही चुनौती दी जा सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 329A
यह प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव संबंधी विशेष प्रावधानों से जुड़ा था। इसे 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 330
यह लोकसभा में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 330A
यह लोकसभा में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है, जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों का एक-तिहाई भी शामिल है। इसका क्रियान्वयन संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार जनगणना और परिसीमन के बाद होगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 331
यह राष्ट्रपति को लोकसभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए अधिकतम दो सदस्यों को नामित करने की व्यवस्था करता था, यदि समुदाय का पर्याप्त प्रतिनिधित्व न हो। यह विशेष नामांकन व्यवस्था 104वें संविधान संशोधन, 2020 के बाद समाप्त हो गई।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 332
यह राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 332A
यह राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए लगभग एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। इसका क्रियान्वयन संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार जनगणना और परिसीमन के बाद होगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 333
यह राज्य विधानसभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए राज्यपाल द्वारा एक सदस्य नामित करने की व्यवस्था करता था। यह विशेष नामांकन व्यवस्था 104वें संविधान संशोधन, 2020 के बाद समाप्त हो गई।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 334
यह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण की अवधि निर्धारित करता है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार यह आरक्षण 2030 तक जारी रहेगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 334A
यह लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण के लागू होने, अवधि तथा रोटेशन से संबंधित प्रावधान करता है। इसका क्रियान्वयन संविधान में निर्धारित जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया के बाद होगा।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 335
यह सरकारी सेवाओं और पदों पर नियुक्तियों में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के दावों पर विचार करने का प्रावधान करता है, प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने की आवश्यकता के साथ।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 336
यह संविधान लागू होने के बाद एंग्लो-इंडियन समुदाय के कुछ सदस्यों के लिए सरकारी सेवाओं में नियुक्तियों से संबंधित एक ऐतिहासिक संक्रमणकालीन प्रावधान था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 337
यह एंग्लो-इंडियन समुदाय के शैक्षणिक संस्थानों को कुछ अनुदान देने से संबंधित ऐतिहासिक संक्रमणकालीन प्रावधान था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 338
यह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की स्थापना और उसके कार्य निर्धारित करता है। आयोग अनुसूचित जातियों के संवैधानिक संरक्षणों की निगरानी करता है और शिकायतों की जाँच करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 338A
यह राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की स्थापना करता है। आयोग अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों और संवैधानिक संरक्षणों की निगरानी करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 338B
यह राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना करता है। आयोग सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के संरक्षणों से संबंधित मामलों की जाँच करता है और सरकार को सलाह देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 339
यह अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण पर संघ के नियंत्रण तथा आयोग की नियुक्ति से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 340
यह राष्ट्रपति को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की जाँच करने तथा उनके कल्याण के उपाय सुझाने के लिए आयोग नियुक्त करने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 341
यह राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जातियों की सूची अधिसूचित करने की शक्ति देता है। इस सूची में बदलाव संसद कानून द्वारा कर सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 342
यह राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जनजातियों की सूची अधिसूचित करने की शक्ति देता है। इस सूची में बदलाव संसद कानून द्वारा कर सकती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 342A
यह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की केंद्रीय सूची से संबंधित प्रावधान करता है। संसद केंद्रीय सूची निर्धारित कर सकती है, जबकि राज्य और केंद्रशासित प्रदेश अपने प्रयोजनों के लिए अलग सूची बना सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 343
यह संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी निर्धारित करता है। अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप है। अंग्रेज़ी के प्रयोग के संबंध में भी संवैधानिक और वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 344
यह राजभाषा आयोग और संसद की समिति के गठन का प्रावधान करता है, जो हिंदी के प्रयोग तथा राजभाषा संबंधी विषयों पर सिफारिशें देती हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 345
यह राज्य विधानमंडल को राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा या हिंदी को राज्य की राजभाषा के रूप में अपनाने की शक्ति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 346
यह राज्यों के बीच तथा राज्य और संघ के बीच आधिकारिक संचार में प्रयुक्त भाषा से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 347
यदि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग किसी भाषा को मान्यता देने की माँग करे, तो राष्ट्रपति उस भाषा के आधिकारिक मान्यता संबंधी निर्देश दे सकते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 348
यह सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, विधेयकों, अधिनियमों और कुछ कानूनी दस्तावेजों में अंग्रेज़ी के प्रयोग से संबंधित प्रावधान करता है, संवैधानिक अपवादों के अधीन।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 349
यह संविधान लागू होने के शुरुआती पंद्रह वर्षों में भाषा संबंधी कुछ कानूनों के लिए विशेष प्रक्रिया निर्धारित करता था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350
प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शिकायत के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी अधिकारी अथवा प्राधिकरण को संघ या राज्य में प्रयुक्त किसी भी भाषा में आवेदन देने का अधिकार है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350A
यह राज्यों और स्थानीय प्राधिकरणों को भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास करने का निर्देश देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 350B
यह भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान करता है, जो उनके संवैधानिक संरक्षणों से संबंधित मामलों की जाँच करके राष्ट्रपति को रिपोर्ट देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 351
यह संघ को हिंदी भाषा के प्रसार और विकास का निर्देश देता है, ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 352
यह युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा को गंभीर खतरा होने पर राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 353
राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने पर केंद्र की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार होता है और संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 354
यह राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व वितरण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों के अस्थायी संशोधन की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 355
यह संघ का कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह राज्यों को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से बचाए तथा यह सुनिश्चित करे कि राज्य सरकार संविधान के अनुसार चले।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 356
यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए, तो राष्ट्रपति राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकते हैं। इसकी घोषणा संसद की मंजूरी और संवैधानिक शर्तों के अधीन होती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 357
यह राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य की विधायी शक्तियों के प्रयोग और उनके संचालन से संबंधित प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 358
यह राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 19 के अधिकारों पर प्रभाव से संबंधित है। यह व्यवस्था केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित आपातकाल में लागू होती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 359
यह राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान राष्ट्रपति को निर्दिष्ट मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित करने की अनुमति देता है। अनुच्छेद 20 और 21 के प्रवर्तन को निलंबित नहीं किया जा सकता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 359A
यह अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर से संबंधित ऐतिहासिक विशेष प्रावधान था। इसे 2019 में संविधान के जम्मू-कश्मीर संबंधी बदलावों के साथ हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 360
यह भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा होने पर वित्तीय आपातकाल घोषित करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 361
यह राष्ट्रपति और राज्यपालों को उनके पद पर रहते हुए कुछ कानूनी कार्यवाहियों से संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है। उनके आधिकारिक कार्यों के लिए न्यायालय में जवाबदेही और आपराधिक कार्यवाही पर विशेष प्रतिबंध लागू होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 361A
यह संसद और राज्य विधानमंडलों की कार्यवाहियों की सच्ची रिपोर्ट प्रकाशित करने पर संरक्षण देता है, बशर्ते प्रकाशन दुर्भावनापूर्ण न हो। गुप्त बैठक की कार्यवाही इस संरक्षण में शामिल नहीं है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 361B
यह दल-बदल के कारण अयोग्य घोषित सदस्य को निर्धारित अवधि तक लाभकारी राजनीतिक पद पर नियुक्त किए जाने से रोकता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 362
यह पूर्व भारतीय रियासतों के शासकों के अधिकारों और विशेषाधिकारों से संबंधित था। इसे 26वें संविधान संशोधन, 1971 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 363
यह कुछ पुरानी संधियों, समझौतों और रियासतों से संबंधित विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 363A
यह पूर्व रियासतों के शासकों की मान्यता समाप्त करने और उनके प्रिवी पर्स को समाप्त करने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 364
यह प्रमुख बंदरगाहों और हवाई अड्डों से संबंधित विशेष प्रावधान करने की राष्ट्रपति की शक्ति से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 365
यदि कोई राज्य केंद्र सरकार के संवैधानिक निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो राष्ट्रपति यह मान सकते हैं कि राज्य में शासन संविधान के अनुसार नहीं चलाया जा रहा है। यह अनुच्छेद अपने आप राष्ट्रपति शासन लागू नहीं करता।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 366
यह संविधान में प्रयुक्त विभिन्न शब्दों और अभिव्यक्तियों की परिभाषाएँ देता है, जैसे अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ, वस्तु एवं सेवा कर तथा अन्य संवैधानिक पद।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 367
यह संविधान की व्याख्या के लिए सामान्य खंड अधिनियम, 1897 के प्रावधानों को आवश्यक संशोधनों के साथ लागू करने की व्यवस्था करता है, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 368
यह संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति और प्रक्रिया निर्धारित करता है। कुछ संशोधनों के लिए कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों की पुष्टि आवश्यक होती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 369
यह संविधान लागू होने के शुरुआती पाँच वर्षों के लिए कुछ राज्य सूची विषयों पर संसद को अस्थायी रूप से कानून बनाने की विशेष शक्ति देता था। यह अवधि समाप्त हो चुकी है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370
यह जम्मू-कश्मीर से संबंधित विशेष संवैधानिक प्रावधानों से जुड़ा था। 2019 में इसके अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी कर दिया गया और जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371
यह महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ क्षेत्रों के विकास तथा क्षेत्रीय संतुलन के लिए विशेष जिम्मेदारियों और व्यवस्थाओं का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371A
यह नागालैंड के धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों, प्रथागत कानूनों, भूमि तथा संसाधनों से संबंधित कुछ मामलों में विशेष संवैधानिक संरक्षण देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371B
यह असम विधानसभा में जनजातीय क्षेत्रों से चुने गए सदस्यों की एक समिति के गठन के लिए विशेष प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371C
यह मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष समिति तथा उनके प्रशासन से संबंधित विशेष प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371D
यह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शिक्षा तथा सरकारी रोजगार के अवसरों में समानता और क्षेत्रीय संतुलन के लिए विशेष प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371E
यह संसद को आंध्र प्रदेश में केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए कानून बनाने की अनुमति देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371F
यह सिक्किम के भारत में विलय के बाद उसकी विशिष्ट परिस्थितियों, विधानसभा, प्रतिनिधित्व और कुछ मौजूदा कानूनों के संबंध में विशेष प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371G
यह मिजोरम के धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों, प्रथागत कानूनों, भूमि स्वामित्व तथा हस्तांतरण से संबंधित कुछ मामलों में विशेष संरक्षण देता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371H
यह अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल को कानून-व्यवस्था के संबंध में विशेष जिम्मेदारी देता है, जिसके प्रयोग में मंत्रिपरिषद से परामर्श किया जाता है और संवैधानिक प्रावधान लागू होते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371I
यह गोवा विधानसभा के सदस्यों की न्यूनतम संख्या से संबंधित विशेष प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 371J
यह कर्नाटक के हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र, जिसे अब कल्याण कर्नाटक क्षेत्र कहा जाता है, के विकास, शिक्षा और सरकारी रोजगार में क्षेत्रीय अवसरों के लिए विशेष प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 372
यह संविधान लागू होने से पहले भारत में लागू कानूनों को तब तक जारी रखने का प्रावधान करता है, जब तक सक्षम विधायिका या प्राधिकारी उन्हें बदल या निरस्त न कर दे।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 372A
यह राष्ट्रपति को संविधान के सातवें संशोधन से संबंधित बदलावों को ध्यान में रखते हुए कुछ कानूनों को अनुकूलित करने की शक्ति देता था। यह एक ऐतिहासिक संक्रमणकालीन प्रावधान था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 373
यह संविधान लागू होने के समय निवारक निरोध के कुछ मामलों में राष्ट्रपति की अस्थायी शक्तियों से संबंधित था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 374
यह संघीय न्यायालय के न्यायाधीशों और लंबित मामलों को सर्वोच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 375
यह संविधान लागू होने के समय कार्यरत न्यायालयों, अधिकारियों और प्राधिकारियों को संविधान के अधीन अपना काम जारी रखने का प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 376
यह संविधान लागू होने के समय उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के संबंध में संक्रमणकालीन प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 377
यह संविधान लागू होने के समय भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पद पर कार्यरत व्यक्ति के संबंध में संक्रमणकालीन व्यवस्था करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 378
यह संविधान लागू होने के समय लोक सेवा आयोगों के सदस्यों के संबंध में संक्रमणकालीन प्रावधान करता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 378A
यह आंध्र प्रदेश विधानसभा की अवधि से संबंधित एक विशेष ऐतिहासिक प्रावधान था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 379
यह अनुच्छेद संविधान लागू होने के समय अस्थायी संसद से संबंधित था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 380
यह अनुच्छेद संविधान लागू होने के समय राष्ट्रपति से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 381
यह अनुच्छेद राष्ट्रपति की मंत्रिपरिषद से संबंधित ऐतिहासिक संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 382
यह अनुच्छेद भाग-B राज्यों की अस्थायी विधानसभाओं से संबंधित था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 383
यह अनुच्छेद प्रांतों के राज्यपालों से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 384
यह अनुच्छेद राज्यपालों की मंत्रिपरिषद से संबंधित ऐतिहासिक संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 385
यह अनुच्छेद भाग-B राज्यों की अस्थायी विधानसभाओं से संबंधित था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 386
यह अनुच्छेद भाग-B राज्यों की मंत्रिपरिषद से संबंधित ऐतिहासिक प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 387
यह अनुच्छेद कुछ चुनावों के लिए जनसंख्या निर्धारण से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 388
यह अनुच्छेद अस्थायी संसद और राज्य विधानसभाओं में आकस्मिक रिक्तियों को भरने से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 389
यह अनुच्छेद संविधान सभा में लंबित विधेयकों के संबंध में संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 390
यह अनुच्छेद संविधान लागू होने के शुरुआती वित्तीय काल में प्राप्तियों और व्ययों से संबंधित संक्रमणकालीन प्रावधान था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 391
यह अनुच्छेद कुछ परिस्थितियों में राज्यों के क्षेत्रों या सीमाओं से संबंधित प्रावधानों में बदलाव करने की राष्ट्रपति की शक्ति से जुड़ा था। इसे सातवें संविधान संशोधन, 1956 द्वारा हटा दिया गया।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 392
यह राष्ट्रपति को संविधान लागू करने में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए आदेश जारी करने की अस्थायी शक्ति देता था। यह संक्रमणकालीन प्रावधान था।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 393
यह संविधान के संक्षिप्त नाम को निर्धारित करता है: “भारत का संविधान”।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 394
यह संविधान के कुछ प्रावधानों के लागू होने की तिथि और शेष संविधान के 26 जनवरी 1950 से लागू होने से संबंधित है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 394A
यह हिंदी भाषा में संविधान के प्रामाणिक पाठ से संबंधित प्रावधान करता है। राष्ट्रपति संविधान के हिंदी पाठ को प्रकाशित कराते हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 395
यह भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 और भारत शासन अधिनियम, 1935 सहित कुछ पुराने संवैधानिक कानूनों को निरस्त करता है, निर्धारित अपवादों के अधीन।
भाग I (पहला भाग) संघ और उसका राज्य क्षेत्र (अनुच्छेद 1 से 4)
भारत का नाम, राज्य क्षेत्र, नए राज्यों का गठन तथा राज्यों की सीमाओं, क्षेत्रों और नामों में परिवर्तन से संबंधित प्रावधान इसमें हैं।
भाग II (दूसरा भाग) नागरिकता (अनुच्छेद 5 से 11)
इसमें संविधान लागू होने के समय नागरिकता से संबंधित प्रावधान हैं। अनुच्छेद 11 संसद को नागरिकता के संबंध में कानून बनाने की शक्ति देता है।
भाग III (तीसरा भाग) मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 12 से 35)
इसमें समानता, स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और शोषण के विरुद्ध संरक्षण जैसे मौलिक अधिकार दिए गए हैं।
भाग IV (चौथा भाग) राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 36 से 51)
इसमें सरकार को कल्याणकारी राज्य बनाने, सामाजिक न्याय स्थापित करने और जनकल्याण के लिए दिशा निर्देश दिए गए हैं।
भाग IVA (भाग 4A) मौलिक कर्तव्य (अनुच्छेद 51A)
इसमें नागरिकों के 11 मौलिक कर्तव्य दिए गए हैं, जैसे संविधान का सम्मान, देश की एकता की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण।
भाग V (पाँचवाँ भाग) संघ सरकार (अनुच्छेद 52 से 151)
इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद, संसद, सर्वोच्च न्यायालय और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग VI (छठा भाग) राज्य सरकार (अनुच्छेद 152 से 237)
इसमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राज्य मंत्रिपरिषद, राज्य विधानमंडल और उच्च न्यायालय से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग VII (सातवाँ भाग) निरसित भाग (पूर्व अनुच्छेद 238)
यह भाग सातवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा निरसित कर दिया गया था।
भाग VIII (आठवाँ भाग) संघ राज्य क्षेत्र (अनुच्छेद 239 से 242)
इसमें केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग IX (नौवाँ भाग) पंचायतें (अनुच्छेद 243 से 243O)
इसमें ग्रामीण स्थानीय स्वशासन, ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग IXA (भाग 9A) नगरपालिकाएँ (अनुच्छेद 243P से 243ZG)
इसमें नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद और नगर निगम जैसी शहरी स्थानीय संस्थाओं से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग IXB (भाग 9B) सहकारी समितियाँ (अनुच्छेद 243ZH से 243ZT)
इसमें सहकारी समितियों के गठन, प्रबंधन, चुनाव और लेखा परीक्षा से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग X (दसवाँ भाग) अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्र (अनुच्छेद 244 से 244A)
इसमें अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन तथा जनजातीय समुदायों के हितों की रक्षा से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XI (ग्यारहवाँ भाग) संघ और राज्यों के बीच संबंध (अनुच्छेद 245 से 263)
इसमें केंद्र और राज्यों के बीच विधायी तथा प्रशासनिक शक्तियों के बँटवारे का वर्णन है।
भाग XII (बारहवाँ भाग) वित्त, संपत्ति, संविदाएँ और वाद (अनुच्छेद 264 से 300A)
इसमें कर, सरकारी राजस्व, वित्त आयोग, सरकारी संपत्ति और संविदाओं से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XIII (तेरहवाँ भाग) व्यापार, वाणिज्य और समागम (अनुच्छेद 301 से 307)
इसमें भारत के भीतर व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XIV (चौदहवाँ भाग) संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ (अनुच्छेद 308 से 323)
इसमें सरकारी सेवाओं, नियुक्तियों तथा संघ लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XIVA (भाग 14A) अधिकरण (अनुच्छेद 323A से 323B)
इसमें प्रशासनिक और अन्य निर्दिष्ट विवादों के निपटारे के लिए अधिकरणों से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XV (पंद्रहवाँ भाग) निर्वाचन (अनुच्छेद 324 से 329A)
इसमें निर्वाचन आयोग, मतदाता सूची और चुनावों के संचालन से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XVI (सोलहवाँ भाग) कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध (अनुच्छेद 330 से 342A)
इसमें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और निर्दिष्ट अन्य वर्गों के प्रतिनिधित्व तथा संरक्षण से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XVII (सत्रहवाँ भाग) राजभाषा (अनुच्छेद 343 से 351)
इसमें संघ की राजभाषा, राज्यों की भाषाओं और हिंदी के विकास से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XVIII (अठारहवाँ भाग) आपातकालीन उपबंध (अनुच्छेद 352 से 360)
इसमें राष्ट्रीय आपातकाल, राष्ट्रपति शासन और वित्तीय आपातकाल से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XIX (उन्नीसवाँ भाग) विविध (अनुच्छेद 361 से 367)
इसमें राष्ट्रपति और राज्यपाल को कुछ संवैधानिक संरक्षण तथा संविधान की व्याख्या से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XX (बीसवाँ भाग) संविधान संशोधन (अनुच्छेद 368)
इसमें संविधान में संशोधन करने की प्रक्रिया और संसद की संशोधन शक्ति से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XXI (इक्कीसवाँ भाग) अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध (अनुच्छेद 369 से 392)
इसमें विशेष परिस्थितियों और कुछ राज्यों के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्थाओं से संबंधित प्रावधान हैं।
भाग XXII (बाईसवाँ भाग) संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन (अनुच्छेद 393 से 395)
इसमें संविधान के संक्षिप्त नाम, लागू होने, हिंदी में प्राधिकृत पाठ और निरसन से संबंधित प्रावधान हैं।
भारतीय संविधान की 12 अनुसूचियाँ
अनुसूची 1 (पहली अनुसूची) राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम तथा उनके क्षेत्र से संबंधित है। इसमें भारत के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संवैधानिक सूची दी गई है।
अनुसूची 2 (दूसरी अनुसूची) राष्ट्रपति, राज्यपाल, संसद और राज्य विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, न्यायाधीशों तथा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों के वेतन, भत्तों और संबंधित प्रावधानों से संबंधित है।
अनुसूची 3 (तीसरी अनुसूची) मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, न्यायाधीशों तथा अन्य निर्दिष्ट पदाधिकारियों द्वारा ली जाने वाली शपथ और प्रतिज्ञान के प्रारूप से संबंधित है।
अनुसूची 4 (चौथी अनुसूची) राज्यों और संबंधित केंद्र शासित प्रदेशों को राज्यसभा में सीटों के आवंटन से संबंधित है।
अनुसूची 5 (पाँचवीं अनुसूची) असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों को छोड़कर अन्य राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन तथा संरक्षण से संबंधित है।
अनुसूची 6 (छठी अनुसूची) असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित है। इसमें स्वायत्त जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों की व्यवस्था है।
अनुसूची 7 (सातवीं अनुसूची) केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन से संबंधित है। इसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं।
अनुसूची 8 (आठवीं अनुसूची) संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं से संबंधित है।
अनुसूची 9 (नौवीं अनुसूची) कुछ कानूनों को विशेष संवैधानिक संरक्षण देने से संबंधित है। इसे प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम, 1951 द्वारा जोड़ा गया था। इसमें शामिल कानून भी निर्धारित परिस्थितियों में न्यायिक समीक्षा के अधीन हो सकते हैं।
अनुसूची 10 (दसवीं अनुसूची) दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित है। इसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था। इसमें सांसदों और विधायकों की दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के प्रावधान हैं।
अनुसूची 11 (ग्यारहवीं अनुसूची) पंचायतों से संबंधित 29 विषयों का उल्लेख करती है। इसे 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया था। इसमें कृषि, ग्रामीण आवास, पेयजल, सड़कें, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे विषय शामिल हैं।
अनुसूची 12 (बारहवीं अनुसूची) नगरपालिकाओं से संबंधित 18 विषयों का उल्लेख करती है। इसे 74वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा जोड़ा गया था। इसमें नगर नियोजन, जलापूर्ति, स्वच्छता, सड़कें, अग्निशमन और शहरी गरीबी उन्मूलन जैसे विषय शामिल हैं।
संविधान संशोधन
1 पहला संविधान संशोधन 1951 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाए गए और नौवीं अनुसूची जोड़ी गई।
2 दूसरा संविधान संशोधन 1952 लोकसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया।
3 तीसरा संविधान संशोधन 1954 आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन और वितरण पर संसद की कानून बनाने की शक्ति बढ़ाई गई।
4 चौथा संविधान संशोधन 1955 संपत्ति अधिग्रहण और भूमि सुधार कानूनों से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया।
5 पाँचवाँ संविधान संशोधन 1955 राज्यों की सीमाओं और नाम में बदलाव पर राज्य विधानमंडल की राय देने की समय सीमा तय करने की शक्ति राष्ट्रपति को दी गई।
6 छठा संविधान संशोधन 1956 अंतरराज्यीय बिक्री और खरीद पर कर लगाने से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया।
7 सातवाँ संविधान संशोधन 1956 राज्यों का पुनर्गठन किया गया और केंद्रशासित प्रदेशों की नई व्यवस्था बनाई गई।
8 आठवाँ संविधान संशोधन 1959 अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातियों और एंग्लो इंडियन समुदाय के विशेष प्रतिनिधित्व की अवधि बढ़ाई गई।
9 नौवाँ संविधान संशोधन 1960 भारत पाकिस्तान समझौते के अनुसार कुछ क्षेत्रों के हस्तांतरण का प्रावधान किया गया।
10 दसवाँ संविधान संशोधन 1961 दादरा और नगर हवेली को भारतीय संघ में शामिल करके केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।
11 ग्यारहवाँ संविधान संशोधन 1961 उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया में बदलाव किया गया।
12 बारहवाँ संविधान संशोधन 1962 गोवा दमन और दीव को भारतीय संघ में शामिल करके केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।
13 तेरहवाँ संविधान संशोधन 1962 नागालैंड के लिए विशेष प्रावधान किए गए और अनुच्छेद 371A जोड़ा गया।
14 चौदहवाँ संविधान संशोधन 1962 पुदुचेरी को भारतीय संघ में शामिल किया गया और कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में विधानमंडल की व्यवस्था का प्रावधान किया गया।
15 पंद्रहवाँ संविधान संशोधन 1963 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष की गई।
16 सोलहवाँ संविधान संशोधन 1963 भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए संवैधानिक प्रावधानों में बदलाव किया गया।
17 सत्रहवाँ संविधान संशोधन 1964 भूमि सुधार कानूनों को संरक्षण दिया गया और संपत्ति की परिभाषा में बदलाव किया गया।
18 अठारहवाँ संविधान संशोधन 1966 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के गठन तथा उनके क्षेत्रों में बदलाव से संबंधित अनुच्छेद 3 को स्पष्ट किया गया।
19 उन्नीसवाँ संविधान संशोधन 1966 चुनाव न्यायाधिकरण समाप्त किए गए और चुनाव याचिकाओं की सुनवाई उच्च न्यायालयों को सौंपी गई।
20 बीसवाँ संविधान संशोधन 1966 जिला न्यायाधीशों की कुछ नियुक्तियों और उनके निर्णयों को वैधता देने के लिए अनुच्छेद 233A जोड़ा गया।
21 इक्कीसवाँ संविधान संशोधन 1967 सिंधी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
22 बाईसवाँ संविधान संशोधन 1969 असम के भीतर मेघालय नामक स्वायत्त राज्य बनाने का प्रावधान किया गया।
23 तेईसवाँ संविधान संशोधन 1969 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण तथा एंग्लो इंडियन समुदाय के विशेष प्रतिनिधित्व की अवधि बढ़ाई गई।
24 चौबीसवाँ संविधान संशोधन 1971 संसद को मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति स्पष्ट रूप से दी गई।
25 पच्चीसवाँ संविधान संशोधन 1971 संपत्ति के अधिकार और मुआवजे से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया तथा अनुच्छेद 31C जोड़ा गया।
26 छब्बीसवाँ संविधान संशोधन 1971 पूर्व रियासतों के शासकों के प्रिवी पर्स और विशेष मान्यताएँ समाप्त की गईं।
27 सत्ताईसवाँ संविधान संशोधन 1971 पूर्वोत्तर क्षेत्रों के प्रशासन और मणिपुर तथा त्रिपुरा सहित कुछ क्षेत्रों की संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव किया गया।
28 अट्ठाईसवाँ संविधान संशोधन 1972 भारतीय सिविल सेवा के पूर्व अधिकारियों से संबंधित विशेष संवैधानिक प्रावधान समाप्त किए गए।
29 उनतीसवाँ संविधान संशोधन 1972 केरल के कुछ भूमि सुधार कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
30 तीसवाँ संविधान संशोधन 1972 सर्वोच्च न्यायालय में दीवानी मामलों की अपील से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया।
31 इकतीसवाँ संविधान संशोधन 1973 लोकसभा में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व से संबंधित सीटों की अधिकतम संख्या बढ़ाई गई।
32 बत्तीसवाँ संविधान संशोधन 1973 आंध्र प्रदेश में क्षेत्रीय समानता और तेलंगाना क्षेत्र के लोगों के हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए।
33 तैंतीसवाँ संविधान संशोधन 1974 सांसदों और विधायकों के इस्तीफे से संबंधित प्रावधान किए गए ताकि इस्तीफा स्वैच्छिक और वास्तविक होने की पुष्टि की जा सके।
34 चौंतीसवाँ संविधान संशोधन 1974 भूमि सुधार से संबंधित कई कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
35 पैंतीसवाँ संविधान संशोधन 1974 सिक्किम को भारतीय संघ से संबद्ध राज्य का दर्जा दिया गया।
36 छत्तीसवाँ संविधान संशोधन 1975 सिक्किम को भारत का पूर्ण राज्य बनाया गया और संविधान में अनुच्छेद 371F जोड़ा गया।
37 सैंतीसवाँ संविधान संशोधन 1975 अरुणाचल प्रदेश के लिए विधानसभा और मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई।
38 अड़तीसवाँ संविधान संशोधन 1975 आपातकाल और राष्ट्रपति तथा राज्यपाल की कुछ संतुष्टि संबंधी घोषणाओं को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखने का प्रावधान किया गया।
39 उनतालीसवाँ संविधान संशोधन 1975 राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव संबंधी विवादों के निपटारे के प्रावधानों में बदलाव किया गया।
40 चालीसवाँ संविधान संशोधन 1976 समुद्री क्षेत्र और महाद्वीपीय शेल्फ के संसाधनों पर संघ की शक्तियों से संबंधित प्रावधान किए गए तथा कई कानून नौवीं अनुसूची में शामिल किए गए।
41 इकतालीसवाँ संविधान संशोधन 1976 राज्य लोक सेवा आयोगों और संयुक्त लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों तथा सदस्यों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष की गई।
42 बयालीसवाँ संविधान संशोधन 1976 इसे लघु संविधान भी कहा जाता है। प्रस्तावना में समाजवादी पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए। मौलिक कर्तव्य जोड़े गए और केंद्र की शक्तियों में कई बदलाव किए गए।
43 तैंतालीसवाँ संविधान संशोधन 1977 आपातकाल के दौरान किए गए कुछ प्रावधानों को हटाकर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों की न्यायिक शक्तियाँ बहाल की गईं।
44 चवालीसवाँ संविधान संशोधन 1978 संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बनाया गया। राष्ट्रीय आपातकाल से संबंधित सुरक्षा उपायों में बदलाव किए गए।
45 पैंतालीसवाँ संविधान संशोधन 1980 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण तथा एंग्लो इंडियन समुदाय के विशेष प्रतिनिधित्व की अवधि 1990 तक बढ़ाई गई।
46 छियालीसवाँ संविधान संशोधन 1982 बिक्री कर से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया ताकि कुछ विशेष प्रकार के लेनदेन पर कर लगाया जा सके।
47 सैंतालीसवाँ संविधान संशोधन 1984 भूमि सुधार से संबंधित कई कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
48 अड़तालीसवाँ संविधान संशोधन 1984 पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने के लिए विशेष प्रावधान किया गया।
49 उनचासवाँ संविधान संशोधन 1984 त्रिपुरा के जनजातीय क्षेत्रों को संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत लाने का प्रावधान किया गया।
50 पचासवाँ संविधान संशोधन 1984 सशस्त्र बलों और खुफिया संगठनों से जुड़े कुछ व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों पर कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था की गई।
51 इक्यावनवाँ संविधान संशोधन 1984 पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण से संबंधित प्रावधान किए गए।
52 बावनवाँ संविधान संशोधन 1985 दल-बदल विरोधी कानून लागू किया गया और संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी गई।
53 तिरपनवाँ संविधान संशोधन 1986 मिजोरम के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान किए गए और अनुच्छेद 371G जोड़ा गया।
54 चौवनवाँ संविधान संशोधन 1986 उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किया गया।
55 पचपनवाँ संविधान संशोधन 1986 अरुणाचल प्रदेश को राज्य का दर्जा दिया गया और अनुच्छेद 371H जोड़ा गया।
56 छप्पनवाँ संविधान संशोधन 1987 गोवा को राज्य का दर्जा दिया गया और दमन तथा दीव को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।
57 सत्तावनवाँ संविधान संशोधन 1987 पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व से संबंधित विशेष प्रावधान किए गए।
58 अट्ठावनवाँ संविधान संशोधन 1987 संविधान के हिंदी पाठ को प्रामाणिक रूप देने के लिए अनुच्छेद 394A जोड़ा गया।
59 उनसठवाँ संविधान संशोधन 1988 पंजाब में आंतरिक अशांति की स्थिति में आपातकाल से संबंधित विशेष प्रावधान किए गए।
60 साठवाँ संविधान संशोधन 1988 पेशे और व्यवसाय पर कर की अधिकतम सीमा 250 रुपये से बढ़ाकर 2500 रुपये प्रति वर्ष की गई।
61 इकसठवाँ संविधान संशोधन 1988 मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।
62 बासठवाँ संविधान संशोधन 1989 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण की अवधि 2000 तक बढ़ाई गई।
63 तिरसठवाँ संविधान संशोधन 1989 पंजाब में आपातकाल से संबंधित कुछ विशेष प्रावधानों को समाप्त किया गया।
64 चौंसठवाँ संविधान संशोधन 1990 पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने का प्रावधान किया गया।
65 पैंसठवाँ संविधान संशोधन 1990 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
66 छियासठवाँ संविधान संशोधन 1990 भूमि सुधार से संबंधित कई कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
67 सड़सठवाँ संविधान संशोधन 1990 पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने की व्यवस्था की गई।
68 अड़सठवाँ संविधान संशोधन 1991 पंजाब में राष्ट्रपति शासन की अवधि अधिकतम पाँच वर्ष तक बढ़ाने का प्रावधान किया गया।
69 उनहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1991 दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का दर्जा दिया गया और विधानसभा तथा मंत्रिपरिषद की व्यवस्था की गई। अनुच्छेद 239AA जोड़ा गया।
70 सत्तरवाँ संविधान संशोधन 1992 राष्ट्रपति के चुनाव के निर्वाचक मंडल में दिल्ली और पुदुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों को शामिल किया गया।
71 इकहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1992 कोंकणी मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
72 बहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1992 त्रिपुरा विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व के लिए विशेष प्रावधान किया गया।
73 तिहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1992 पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया। भाग 9 और ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।
74 चौहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1992 नगरपालिकाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया। भाग 9A और बारहवीं अनुसूची जोड़ी गई।
75 पचहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1994 किराया विवादों के निपटारे के लिए न्यायाधिकरण बनाने का प्रावधान किया गया।
76 छिहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1994 तमिलनाडु के 69 प्रतिशत आरक्षण कानून को नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
77 सतहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1995 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को सरकारी सेवाओं में पदोन्नति के दौरान आरक्षण देने के लिए अनुच्छेद 16(4A) जोड़ा गया।
78 अठहत्तरवाँ संविधान संशोधन 1995 भूमि सुधार से संबंधित कानूनों को नौवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
79 उनासीवाँ संविधान संशोधन 1999 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण की अवधि 2010 तक बढ़ाई गई।
80 अस्सीवाँ संविधान संशोधन 2000 केंद्र और राज्यों के बीच करों के बँटवारे की व्यवस्था में बदलाव किया गया।
81 इक्यासीवाँ संविधान संशोधन 2000 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पिछली रिक्तियों को अलग वर्ग मानकर भरने का प्रावधान किया गया।
82 बयासीवाँ संविधान संशोधन 2000 सरकारी सेवाओं में पदोन्नति के दौरान अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए अर्हक अंकों में छूट देने का प्रावधान किया गया।
83 तिरासीवाँ संविधान संशोधन 2000 अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जातियों की आबादी नहीं होने के कारण पंचायतों में उनके आरक्षण से संबंधित विशेष छूट दी गई।
84 चौरासीवाँ संविधान संशोधन 2001 लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों के पुनर्निर्धारण पर रोक 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के प्रासंगिक आँकड़े प्रकाशित होने तक जारी रखी गई। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की अनुमति दी गई।
85 पचासीवाँ संविधान संशोधन 2001 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पदोन्नति में आरक्षण के साथ परिणामी वरिष्ठता का प्रावधान किया गया।
86 छियासीवाँ संविधान संशोधन 2002 छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का मौलिक अधिकार बनाया गया। अनुच्छेद 21A जोड़ा गया।
87 सत्तासीवाँ संविधान संशोधन 2003 निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के लिए 2001 की जनगणना के आँकड़ों के उपयोग का प्रावधान किया गया।
88 अट्ठासीवाँ संविधान संशोधन 2003 सेवा कर से संबंधित संवैधानिक प्रावधान किए गए।
89 नवासीवाँ संविधान संशोधन 2003 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को अलग-अलग किया गया।
90 नब्बेवाँ संविधान संशोधन 2003 असम के बोडोलैंड क्षेत्र में विधानसभा प्रतिनिधित्व से संबंधित विशेष प्रावधान किए गए।
91 इक्यानवेवाँ संविधान संशोधन 2003 केंद्रीय और राज्य मंत्रिपरिषद के आकार पर सीमा निर्धारित की गई तथा दल-बदल विरोधी कानून को मजबूत किया गया।
92 बानवेवाँ संविधान संशोधन 2003 बोडो डोगरी मैथिली और संथाली भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
93 तिरानवेवाँ संविधान संशोधन 2005 शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के प्रवेश में विशेष प्रावधान करने की अनुमति दी गई। अल्पसंख्यक संस्थान अपवाद हैं।
94 चौरानवेवाँ संविधान संशोधन 2006 कुछ राज्यों में जनजातीय कल्याण मंत्री की व्यवस्था से संबंधित प्रावधान बदले गए।
95 पंचानवेवाँ संविधान संशोधन 2009 अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण की अवधि 2020 तक बढ़ाई गई।
96 छियानवेवाँ संविधान संशोधन 2011 आठवीं अनुसूची में भाषा के नाम Oriya से बदलकर Odia किया गया।
97 सत्तानवेवाँ संविधान संशोधन 2011 सहकारी समितियों के गठन और संचालन से संबंधित प्रावधान जोड़े गए तथा अनुच्छेद 19(1)(c) और 43B में बदलाव किया गया।
98 अट्ठानवेवाँ संविधान संशोधन 2012 कर्नाटक के हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र के विकास के लिए अनुच्छेद 371J जोड़ा गया।
99 निन्यानवेवाँ संविधान संशोधन 2014 राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की व्यवस्था की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।
100 सौवाँ संविधान संशोधन 2015 भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौते को लागू करने का प्रावधान किया गया।
101 एक सौ पहला संविधान संशोधन 2016 वस्तु एवं सेवा कर यानी GST लागू करने के लिए संवैधानिक व्यवस्था की गई।
102 एक सौ दूसरा संविधान संशोधन 2018 राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया गया।
103 एक सौ तीसरा संविधान संशोधन 2019 आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में अधिकतम 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया।
104 एक सौ चौथा संविधान संशोधन 2019 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण की अवधि 2030 तक बढ़ाई गई। एंग्लो इंडियन समुदाय के मनोनीत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था समाप्त की गई।
105 एक सौ पाँचवाँ संविधान संशोधन 2021 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की अपनी पिछड़ा वर्ग सूची तैयार करने की शक्ति स्पष्ट की गई।
106 एक सौ छठा संविधान संशोधन 2023 लोकसभा दिल्ली विधानसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया। इसका लागू होना संबंधित जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पर निर्भर है।
Comments